इन दिनों गांव से लेकर शहर तक साग का मौसम है. थाली में एक साग न हो तो भोजन प्रेमियों का मन नहीं मानता. शहरों में तो अब मंडी चले जाइये, जो चाहे वही साग उपलब्ध है, मगर गांव में साग हासिल करने के लिए खेत-खेत भटकना पड़ता है. साग का प्रेम सबसे अधिक महिलाओं को होता है, खास तौर पर नवयुवतियों को. वे इस मौसम में पूरे देश खेतों में भटकती रहती हैं, साग पाने के लिए. इससे उन्हें साग तो मिल ही जाता है, लड़कियों की रंग बिरंगी पोशाकें और उन्मुक्त हंसी की वजह से गांवों में बेमौसम बसंत आ जाता है. इसी नजारे को शब्दों में गूंथा है मिथिलेश कुमार राय ने... पढ़कर बताइये कैसा बना है.
हां, तसवीर सांकेतिक है...
मिथिलेश कुमार राय
इन दिनों स्कूलों में छुट्टी के बाद खेतों में लड़कियों का राज हो जाता है. सब्जियों के इस मौसम में गेहूं के खेतों में उगे बथुआ साग और उसके बगल के खेतों में लहलहाते खेसारी साग, सरसों साग उन्हें खूब-खूब आकर्षित करती हैं. स्कूल से आने के बाद लड़कियां खेतों के बीहड़ में उतरने के लिए हड़बड़ाई रहती हैं. कभी-कभी इस झुंड में कोई नव विवाहिता या कोई बुजुर्ग महिलाएं भी शामिल हो जाती हैं. लेकिन जिस दिन ऐसा होता है उस दिन लड़कियों की मस्ती पर असर पड़ जाता है. पैरों में रस्सी जैसा कुछ उलझ जाता है. क्योंकि वे इन्हें नहर के उस पार नहीं जाने देतीं. चौकीदार बन जाती हैं और आँखें तरेरने लगती हैं. गाँव की भी पाबंदी है. साग ही तो तोड़ने जाना है तो इन खेतों में क्या साग की कमी है कि नहर के पार जाएगी. खबरदार. नहर से इधर ही तोड़कर वापस आ जाएं घर! जबकि लड़कियां पैरों की रस्सी खोल खूब कुलांचे भरना चाहती हैं. नहर के उस पार तक. उस पार जहां तक नजर जाती हैं सिर्फ हरियाली ही हरियाली नजर आती हैं. सुरसरि तक. आँखों को खूब सकून मिलता है. मन को कितनी शांति मिलती है. जोरजोर से हंसो. खूब चिल्लाओ. कोई टोकनेवाला नहीं. अब तो सरसों में भी फूल आने लगे हैं. कितना अच्छा लगता है.
गेहूं के खेतों में दर्जन-दर्जन भर लड़कियां उतरकर बथुआ का साग खोंटने लगी हैं. तभी किसी ने कुछ ऐसा कहा कि हंसी ने बाँध तोड़ दी. वातावरण खिलखिलाने लगा. लेकिन बुढ़िया ने टोक दिया तो ठहाके पर लगाम लग गयी. यही नहीं सुहाता.
बथुआ खोटते-खोटते लड़कियाँ इधर-उधर देखती हैं और बगल के खेसारी के खेत में छलांग लगा देती हैं. हाथ बढ़ाकर थोड़ा सा धनिया नोच लेती हैं. सरसों का पत्ता भी एक-आध मुट्ठी तोड़ लेती हैं. लेकिन तभी दूर से एक आवाज आती है. यह खेत मालिक की आवाज है. जिसे सुनकर लड़कियाँ दौड़कर फिर बथुआ खोंटने बैठ जाती है. बथुआ एकदम फ्री है. खेसारी, धनिया, सरसों पर टैक्स लगा है जैसे! लेकिन आँख बचाकर खोटने से कौन रोक सकता है भला! खोंइछा में नीचे खेसारी और ऊपर बथुआ. पकड़े जाने पर दूर से खोंइछा में पड़ा बथुआ दिखाकर खिलखिलाती हुई घर की ओर दुलक पड़ती हैं.
बथुआ चंगेरा में डालकर घर के छप्पर पर रात भर शीत में और खेसारी पकाकर सुबह तक बासी होने के लिए छोड़ दिया गया है. बासी खेसारी और अदरकवाला बथुआ का कोई जवाब नहीं. ऊपर से धनिया की चटनी. फिर भात हो या रोटी-पेट भर जाता है, मन नहीं भरता !
लिकर किंग और यूबी ग्रुप ऑफ कंपनीज के प्रबंध निदेशक विजय माल्या पर पटना जिले के नौबतपुर के किसानों ने मुकदमा कर दिया है. किसानों ने उन पर जमीन खरीदने के बाद मुआवजे के नाम पर टालमटोल करने का आरोप लगाया है.किसानों ने उनके खिलाफ दानापुर कोर्ट में परिवाद दायर किया है. वहां प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी उमाशंकर प्रसाद सिंह ने नौबतपुर के कोपा कला गांव के एक दर्जन किसानों के परिवाद पर सुनवाई करते हुए विजय माल्या पर केस दर्ज करने का आदेश दिया. विजय माल्या और उनके 4 सहयोगियों पर नौबतपुर थाना में आईपीसी की धारा 147, 148, 323, 420, 407 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया है.
मुकदमा क्यों
दरअसल 2007 में सरकार ने नौबतपुर प्रखंड के कोपा कला और चैनपुरा गांव के किसानों से चीनी मिल के लिए उनकी उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण के लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए थे. उसके बाद 96 एकड़ जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई। कई किसानों ने मुआवजा भी ले लिया. लेकिन इसी बीच 2011 में सरकार ने 96 में से 42 एकड़ जमीन बियाडा के जरिए विजय माल्या की कंपनी यूबी ऑफ कंपनीज को शराब फैक्ट्री बनाने के लिए दे दी और जब मुआवजा की बात आई तो कंपनी ने किसानों से टाल मटोल शुरू कर दी. सरकार के इस फैसले का किसानों ने जमकर विरोध किया. इस मामले में कई किसानों पर केस भी दर्ज कराए गए.
झारखंड के 12 सांसदों ने आदर्श ग्राम योजना के तहत विकास के लिए 12 ग्राम पंचायतों के नाम सौंप दिये हैं, जबकि सात सांसदों ने अब तक नाम नहीं दिया है. झारखंड में 14 लोकसभा जबकि पांच राज्यसभा सांसद हैं. इनमें से केंद्रीय राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने नाम देने के लिए समय मांगा है. वह अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों व अफसरों के साथ बैठ कर नाम तय करेंगे. उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना चलाने का निर्देश दिया है. इसके तहत हर सांसद को एक-एक गांव की जिम्मेवारी लेनी है, जिसे आदर्श गांव बनाया जायेगा.
जिन्होंने नाम नहीं दिया है-
विजय कुमार हांसदा (राजमहल), कड़िया मुंडा (खूंटी), जयंत सिन्हा (हजारीबाग), निशिकांत दुबे (गोड्डा), रवींद्र राय (कोडरमा), धीरज प्र साहू (राज्यसभा सदस्य) और प्रदीप कु बलमुचु (राज्यसभा सदस्य)
क्या-क्या काम होना है
योजना के तहत गांव को आदर्श ग्राम बनाना है. इसके तहत गांव का सर्वागीण विकास किया जायेगा. इस तरह मॉडल गांव बनाना है. हर सांसद को एक-एक गांव की जिम्मेवारी लेनी है. उसे 2016 तक आदर्श गांव बना देना है. इसके तहत गांव में शिक्षा, चिकित्सा, सड़क, बिजली, रोजगार, पेयजल आदि सुविधाएं उपलब्ध करानी है. गांव में सामाजिक व सांस्कृतिक विकास भी करना है. गांव मे स्मार्ट स्कूल भी बनाना है.
लोगों के लिए पक्का मकान उपलब्ध कराना है. गांवों के लोगों को वृद्धावस्था, विधवा पेंशन मिले, यह भी सुनिश्चित करना है. पर्यावरण के क्षेत्र में भी विकास के कार्य करने हैं. गुड गवर्नेस, सिंचाई की पूरी व्यवस्था, उन्नत कृषि, गांवों का बेहतर बाजार सुनिश्चित करना है. इसके साथ ही टेलीफोन सुविधा भी उपलब्ध करानी है. ग्रामीणों की साक्षरता की दिशा में काम करना है.
अभी सांसद कोटे से होगा काम
फिलहाल आदर्श गांव बनाने के लिए राशि की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की गयी है. ऐसे में अभी सांसद कोटे की राशि से ही काम कराना है. दूसरे मद से राशि की व्यवस्था हो जाने पर उससे गांव में विकास के कार्य कराये जायेंगे.
सांसदों ने इन प्रखंडों के गांवों का नाम दिया है
सांसद--संसदीय क्षेत्र--प्रखंड
शिबू सोरेन--दुमका--मसलिया
रामटहल चौधरी--रांची--नामकुम
सुदर्शन भगत-- गुमला-- बिशुनपुर
विद्युत वरण महतो-- जमशेदपुर-- पटमदा
रवींद्र कुमार पांडेय-- गिरिडीह-- टुंडी
पीएन सिंह-- धनबाद-- गोविंदपुर
लक्ष्मण गिलुआ-- प सिंहभूम-- गोइलकेरा
सुनील सिंह-- चतरा-- कान्हाचट्टी
बीडी राम-- पलामू-- पाटन
संजीव कुमार-- राज्यसभा-- टुंडी
परिमल नथवाणी-- राज्यसभा-- नामकुम
प्रेमचंद गुप्ता-- राज्यसभा-- मरकच्चो
साभार- प्रभात खबर
सुनील कुमार झा की पहचान शोधपरक खबरों के पत्रकार के रूप में है. वे खबरों के लिए पर्याप्त समय लेते हैं और अपनी खबर को मुकम्मल तरीके से पेश करते हैं. इन दिनों वे बिहार के जूट उद्योग के पतन की कहानी के तथ्य जुटाने में लगे हैं. हमने पगडंडी के लिए उनकी इस खबर पर पहले से दावा पेश कर दिया है. :) इससे पहले हम उनकी एक और बड़ी खबर पेश कर रहे हैं. यह खबर बिहार के चीनी उद्योग के पतन के बारे में है. चीनी उद्योग हो या जूट उद्योग दोनों का नाता गांव औऱ खेती किसानी से है. इन दोनों उद्योगों के पतन का असर यहां की किसानी और किसानों की आर्थिक हालत पर पड़ता है. इसलिए गांव और किसानी से जुड़े लोगों को यह समझना जरूरी है कि किस तरह उद्योगों का बना बनाया ढांचा भरभरा कर गिर जाता है. और एक झटके में लाखों लोग अर्श से फर्श पर आ जाते हैं. यह रपट काफी पहले लिखी गयी है, हो सकता है कई लोगों ने इसे पहले पढ़ा होगा इ-समाद में. मगर वह रिपोर्ट मैथिली में थी. अब यह रपट हिंदी में आपके सामने है. इस रपट के लिए हम सुनील कुमार झा के साथ-साथ नीलू कुमारी और इ-समाद के भी आभारी हैं. रपट पेश है...

एक समय था जब देश के चीनी उत्पादन का 40 फीसदी चीनी बिहार से आता था, अब यह मुश्किल से 4 फीसदी रह गया है। आजादी से पहले बिहार में 33 चीनी मिलें थीं, अब 28 रह गई हैं। इसमें से भी 10 निजी प्रबंधन में चल रही हैं। जिनमें बगहा और मोतिहारी की स्थिति जर्ज़र हो चुकी है। जहाँ सकरी का अस्तित्व मिट चुका है और रैयाम चीनी मिल अपनी दुर्दशा पर आँशु बहा रहा है वहीँ सबसे पुराना लोहट चीनी मिल अपने उद्धारक का इन्तेजार कर रहा है। क्या है बिहार में चीनी मीलों का इतिहास और वर्तमान की शोधपरक रिपोर्ट में पत्रकार नीलू कुमारी और सुनील कुमार झा ने कई पहलूओं और कारणों पर प्रकाश डाला है। यह आलेख निश्चित रूप से आपकी जिज्ञासा शांत करेगा। - समदिया
शर्करा से चीनी तक - चीनी का प्रयोग भारत में कब से हो रहा है ये शायद अभी ज्ञात नहीं हो पा रहा है लेकिन अथर्ववेद और रामायण में एक से कही ज्यादा बार इसका प्रयोग (चीनी शब्द संस्कृत के शर्करा, और प्राकृत के सक्कर शब्द से व्युत्पित हुआ है ) ये दिखाता है की चीनी भारत में करीब ३००० वर्ष पुराना है। मनू, चरक और सूश्रुत संहिता में इसका उल्लेख दवाओं के रूप में किया गया है। मैगस्थनीज और चाणक्य के अर्थशास्त्र (321 से 296 ईपू) में भी इसका उल्लेख है। एक चीनी एनस्कालोपिडिया में यह रिकॉर्ड है की सम्राट ताई सुंग (६२७ से ६५० AD ) के शासनकाल के दौरान चीनी सरकार ने चीनी छात्रो के एक बैच को बिहार भेजा था, ताकि वो गन्ना और चीनी के विनिर्माण की खेती की विधि का अध्यन कर सके। उस वक्त भारत का पूर्वी हिस्सा चीनी उत्पादन में माहारथ हासिल कर चुका था और विदेशों में निर्यात करने लगा था। लेकिन 1453 में इंडोनेशिया पर तुर्क शासन के बाद निर्यात पर अतिरिक्त कर का बोझ बढने से इसके कारोबार पर प्रतिकूल असर पडा। और धीरे धीरे यह कारोबार दम तोड दिया। इधर विदेशों में चीनी की मांग बढती रही।
नील से ईख तक का सफर - 1792 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने विदेशो में उठ रही चीनी की माँग को देखते हुए अपना एक प्रतिनिधि मंडल भारत भेजा। चीनी उत्पादन की संभावनाओं का पता लगाने के लिए लुटियन जे पीटरसन के नेतृत्व में भारत आया प्रतिनिधिमंडल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बंगाल प्रसिडेंसी के तिरहुत ईलाके में न केवल जमीन उपयुक्त है, बल्कि यहां सस्ते मजदूर और परिवहन की सुविधा भी मौजूद है। उस वक्त यह ईलाका नील की खेती के लिए जाना जाता था। इस रिपोर्ट के आने के बाद नील की खेती में मुनाफा कम देख ईलाके के किसान भी ईख की खेती को अपनाने लगे। इधर, ईख पैदावार के साथ ही 1820 में चंपारण क्षेत्र के बराह स्टेट में चीनी की पहली शोधक मिल स्थापित की गयी। मिस्टर स्टीवर्ट की अगुवाई में 300 टन वाले इस कारखाने में ईख रस से आठ फीसदी तक चीनी का उत्पादन होता था। यहां उत्पादित चीनी तिरहुत ईलाके के लोगों को देखने के लिए भी नहीं मिलता था और सारा माल पंजाब समेत पश्चिमी भारत में भेज दिया जाता था। 1877 आते आते पश्चिमी तिरहुत के 5 हजार हैक्टेयर वाली नील की खेती सिमट कर 1500 हैक्टेयर में रह गयी और 2 हजार हैक्टेयर में ईख की खेती शुरू हो गयी। 1903 आते आते ईख ने तिरहुत से नील को हमेशा के लिए विदा कर दिया।
आधुनिक चीनी मिलों का आगमन- तिरहुत का र्ईलाका परिस्कृत चीनी का स्वाद 19वीं शताब्दी में चख पाया, जब यहां चीनी उद्योग का विकास प्रारंभ हुआ। १९०३ से तिरहुत में आधुनिक चीनी मिलों का आगमन शुरू हुआ। 1914 तक चंपारण के लौरिया समेत दरभंगा जिले के लोहट और रैयाम चीनी मिलों से उत्पादन शुरू हो गया। 1918 में न्यू सीवान और 1920 में समस्तीपुर चीनी मिल शुरू हो गया। इस प्रकार क्षेत्र में चीनी उत्पादन की बडी ईकाई स्थापित हो गयी, लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण इसका तेजी से विकास नहीं हो पाया। प्रथम विश्व युद्ध के समय इनकी कुछ प्रगति अवश्य हुई, लेकिन ये विदेशी प्रतियोगी के आगे टिकी नहीं । 1929 तक भारत में यह कारोबार संकटग्रस्त हो गया और देश में चीनी मीलों की संख्या घटकर सिर्फ 32 रह गयी, जिनमें पांच तिरहुत क्षेत्र से थे।
संरक्षण का उठाया फायदा – तिरहुत चीनी उद्योग की यह अवस्था नहीं हुई होती यदि 1920 की चीनी जाँच समिति द्वारा इसके संरक्षण की सिफारिस की गई होती। बाद में सम्राजीय कृषि गवेषणा परिषद् ने ईख उत्पादकों के हितो की रक्षा के लिए चीनी उद्योग को संरक्षण देने की सिफारिश की। फलतः 1932 में पहली बार 7 वर्षो के लिए इस उद्योग को संरक्षण दिया गया। तिरहुत ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और यहां जिस तीव्रता से इस उद्योग का विकास हुआ वह संरक्षण की सार्थकता को सिद्ध करता है। चार वर्ष के भीतर ही चीनी मीलों की संख्या 7 से बढ़कर 17 हो गयी। चीनी का उत्पादन 6 गुना बढ़ गया, आयात किये गए चीनी यंत्रों का मुल्य 8 गुना बढ़ गया। संरक्षण प्रदान करने के 6 वर्ष के भीतर ही चीनी आयात में साढ़े आठ करोड़ रूपये की कमी हो गयी और केवल 25 लाख रूपये के चीनी का आयत भारत में किया गया। चीनी कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला लाभांश जो 1923 और 31 के बीच औसतन 11.2% था बढ़कर 1932 में 19.5% हो गया और 1934 में 17.2% हो गया।
चीनी मामले में आत्म निर्भर – 1937 में चीनी प्रशुल्क बोर्ड ने चीनी उद्योग को दो साल और संरक्षण देने की सिफारिश की। बोर्ड की सिफारिश मंजूर होने के बाद तिरहुत में चीनी की बढती उत्पादकता से 1938 -39 में भारत ना केवल चीनी के मामले में आत्मनिर्भर हो गया था, अपितु अतिरिक्त उत्पादन भी करने लगा था। उद्योग को दिया गया संरक्षण इसका प्रमुख कारण था। दूसरा कारण ये भी था कि दूसरे विश्व युद्ध के कारण कच्चा माल तथा यंत्रों की लागत अत्यंत कम हो गयी थी जो इस उद्योग के प्रसार में सहायक सिद्ध हुआ। लेकिन 1937 में विश्व के 21 प्रमुख चीनी उत्पादक देशो में हुए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते से संरक्षण का लाभ प्रभावित हुआ। इस समझौते में निर्यात का कोटा तय हुआ और वर्मा को छोड़कर समुद्र के रास्ते अन्य किसी भी देश में चीनी का निर्यात करने के लिए भारत पर 5 वर्षो के लिए रोक लगा दी गयी। इसके कारण 1942 तक बिहार सहित पूरे भारत में अति उत्पादकता की समस्या पैदा हो गयी। इसलिए कई चीनी मिले निष्क्रिय हो गयी।
आधिपत्य को लेकर बढा तनाव – चीनी की अधिकता से उत्पन्न परिस्थिति का सामना करने के लिए चीनी उत्पादकों ने चीनी संघ की स्थापना की, ताकि चीनी के मूल्य के ह़ास को रोका जा सके। यह संघ अपने सदस्य कारखानों के द्वारा चीनी के बिक्री को सुनिश्चित करने लगा।
1966-67 तक बिहार के निजी मिल मालिकों ने चीनी कंपनियों पर पूरी तरह अपना कब्जा जमा लिया और ऐसी नीति अपनाने लगे ताकि चीनी पर से सरकार का नियत्रण पूर्ण रूप से खत्म हो जाये। इस कारण चीनी मीलों पर मालिकों और सरकार के बीच टकराव बढने लगे। 1972 में केंद्र सरकार द्वारा चीनी उद्योग जाँच समिति की स्थापना की। चीनी उद्योग की स्थिति और समस्या की जांच कर यह समिति 1972 के आखिरी सप्ताह में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने सरकार को चीनी कारखानों का अधिग्रहण करने का सुझाव दिया। फलस्वरूप 1977 से 85 के बीच 15 से ज्यादा चीनी मिलों का अधिग्रहण बिहार सरकार ने किया। इसमें समस्तीपुर (समस्तीपुर शुगर सेन्ट्रल शुगर लिमिटेड ), रैयाम ( तिरहुत कोपरेटिव शुगर कंपनी लिमिटेड ), गोरौल( शीतल शुगर वर्क्स लिमिटेड), सिवान ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), गुरारू ( गुरारू चीनी मिल), न्यू सिवान ( न्यू सिवान शुगर एंड गुर रिफ़ाइनिग कम्पनी), लोहट ( दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बिहटा ( साउथ बिहार शुगर मिल लिमिटेड), सुगौली( सुगौली शुगर वर्क्स लिमिटेड), हथुआ ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), लौरिया ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), मोतीपुर ( मोतीपुर शुगर फेक्टरी ), सकरी ( दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बनमनखी ( पूर्णिया कोपरेटिव शुगर फेक्टरी लिमिटेड), वारिसलीगंज (वारिसलीगंज कोपरेटिव शुगर मिल लिमिटेड), का अधिग्रहण किया गया।
और बढती गयी मीलों की दुर्दशा - इन मिलों को चलाने के लिए बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की स्थापना 1974 ई० में हुई थी, जो चीनी मिलो के घाटे को नियत्रित कर इसे सुचारू रूप से प्रबंधन करने का काम करता, लेकिन इनमें से ज्यादातर इकाई कीमतों में गिरावट और इनपुट लागत में वृद्धि के दवाब को नहीं झेल सकी। फलस्वरूप एक के बाद एक यूनिट बंद होते चले गये। 1996-97 के पेराई सीज़न के बाद इसको पुनर्जीवित करना बंद हो गया और सारी इकाई बंद पड़ गये। घाटे का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन इकाइयों पर किसानो का 8.84 करोड़ रुपया और कर्मचारियों का 300 करोड़ रुपया बकाया था। 1990 आते आते तिरहुत के ईख की खेती कुछ जिलों तक सिमट कर रह गयी और हजारों हैक्टेयर में गेहूं की खेती शुरू हो गयी। 1997 आते आते गेहूं ने तिरहुत से ईख को नकदी फसल के रूप में विदा कर दिया।
सरकार ने रखे हथियार - फरवरी 2006 में बिहार सरकार आखिरकार हथियार रख दिये और यह स्वीकार कर लिया कि वो बंद मिलों को चलाने में असमर्थ है। 1977 में चीनी मिलो के घाटे को नियत्रित कर इसे सुचारू रूप से प्रबंधन करने का दावा झूठा साबित हुआ। मिलों को फिर से चालू करने के लिए सरकार ने गन्ना विकास आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलायी। इसमें समिति ने राय दी कि बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के बंद पड़े चीनी मीलों को पुनर्जीवित करने के लिए एक वित्तीय सलाहकार को नियुक्त किया जाय, जो इन बंद पड़े चीनी मिलो के पुनरुद्धार के लिए कोई सटीक योजना बना सके। इसके तहत एसबीआई कैपिटल को यह काम सौंपा गया। समिति ने अंततः इन इकाइयों के लिए निविदा आमंत्रित करने का फैसला किया और निजी निवेशको आमंत्रित किया कि वो इन बंद पड़े चीनी मिलो को पुनरुद्धार / पुनर्गठन / लीज़ पर ले सके। शुरुआत से ही निवशकों की दिलचस्पी ना के बराबर रही। पिछले साल भी दिसंबर में टेंडर भरने के आखिरी दिन तक तीन चीनी मिलों के लिए सिर्फ छह आवेदन ही मिले हैं।
पुनरुद्धार के नाम पर मिट गया अस्त्तिव - एसबीआई कैपिटल ने परिसंपत्तियों का मूल्यनिर्धारण, परिचालन और वित्तीय मापदंडों के आधार पर बिहार सरकार को एक संक्षिप्त रिपोर्ट दिया। इसके अनुसार बंद पड़ी १५ मीलों में से १४ मीलों को ही केवल फिर से चलाने का सुझाव दिया जबकि सकरी मिल को विलोप करने की बात कही गयी समिति के अनुसार लोहट और रैयाम के बीच स्थित होने के कारण इस मिल के लिए गन्ना अधिकार क्षेत्र उपलब्ध नहीं सकता है। अतः इसके ११५ एकड़ जमीन को किसी अन्य कार्य के लिए आवंटित किया जाना चाहिए। लोहट के मुनाफे से १९३३ में स्थापित ७८२ टीएमटी क्षमता वाले इस मिल के वजूद को खत्म कर दिया गया। इस प्रकार बिहार के चीनी मीलों के इतिहास में सकरी पहली इकाई रही जो केवल बंद ही नहीं हुई बल्कि उसे हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। सरकार के इस पहल से ऐसा भी नहीं की अन्य मिलें पुनर्जीवित हो गयी सकरी और रैयाम को महज़ 27.36 की बोली लगाकर लीज़ पर लेने वाली कंपनी तिरहुत इंडस्ट्री ने नई मशीन लगाने के नाम पर रैयाम चीनी मिल के सभी साजो सामान बेच चुकी है। २००९ में २०० करोड़ के निवेश से अगले साल तक रैयाम मिल को चालु कर देने का दावा करने वाली यह कम्पनी मिल की पुरानी सम्पति को बेचने के अलावा अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं कर सकी। वैसे बिहार सरकार ने अब तक कुल ५ मीलों को निजी हाथों में सौंपा है जिनमे से केवल दो सुगौली और लौरिया चीनी मिल एक बार फिर चालू हो पाई है जबकि रैयाम और सकरी मीलों का भविष्य निजी हाथों में जाने के वाबजूद अंधकारमय है।
इथेनॉल ने बढा दी मुश्किल - निवेशकों की रुचि चीनी उत्पादन में कम ही रही, वे इथेनॉल के लिए चीनी मिल लेना चाहते थे, जबकि राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं रहा। क्योंकि 28 दिसंबर, 2007 से पहले गन्ने के रस से सीधे इथेनॉल बनाने की मंजूरी थी। उस समय बिहार में चीनी मिलों के लिए प्रयास तेज नहीं हो सका, जब प्रयास तेज हुआ तब दिसंबर, 2007 को गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1996 में संशोधन किया गया, जिसके तहत सिर्फ चीनी मिलें ही इथेनॉल बना सकती हैं। इसका सीधा असर बिहार पर पड़ा है। मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं। ऐसे में बंद चीनी मिलों को चालू करा पाना एक बड़ी चुनौती आज भी है। जानकारों का कहना है की राज्य सरकार पहले पांच साल के कार्यकाल में निवेशकों का भरोसा जीतने का प्रयास करती रही। अब जब निवेशकों की रुचि जगी है, तब केंद्र ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की मांग को खारिज कर राज्य में बड़े निवेश को प्रभावित कर दिया है। जो निवेशक चीनी मीलों को खरीदने के शुरुआती दौर में इच्छा प्रकट की थी वो भी धीरे धीरे अपने प्रस्ताव वापस लेते चले गये।
फिर चाहिए संरक्षण – पिछले पेराई मौसम में 5.07 लाख टन के रिकार्ड उत्पादन के बावजूद चीनी मिलों को करीब 250 करोड का घाटा सहना पड रहा है। बिहार में गन्ने से चीनी की रिकवरी की दर 9.5 फीसदी से घटकर 8.92 फीसदी हो गयी है। बिहार में चीनी का उत्पादन मूल्य करीब 3600 प्रति क्विटल है, जबकि चीनी का मूल्य घटकर 2950 प्रति क्विटंल हो गया है। छोआ का दाम राज्य सरकार ने 187 रुपये तय कर रखा है जबकि उत्तरप्रदेश में इसकी कीमत 300 से 325 रुपये प्रति क्विंटल है। इसी प्रकार स्प्रीट की कीमत बिहार में महज 28 रुपये प्रति लीटर है जबकि उत्तरप्रदेश में 33 से 35 रुपये प्रति लीटर है। ऐसे में बिहार शूगर मिल एसोसिएशन ने सरकार से कैश सब्सिडी 17 की जगह 30 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की है। ऐसे में बिहार के चीनी उद्योग को एकबार फिर संरक्षण की जरुरत हैं। चीनी उद्योग को लेकर बिहार की मीठी यादें यह विश्वास दिलाती है कि आज की कडवी सच्चाई कल एक नयी तसवीर बनकर सामने आयेगी।
साभार - इसमाद.कॉम
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गाँव, गिद्ध, गौरेया गायब
कोठरी, डेहरी, कथरी गायब,
अब तो सूखे साख खड़े हैं
कुआँ ते हैं पनिहारिन गायब !
गाँव किनारे वाला पीपल,
बरगद और लसोंहड़ा गायब,
मूंज, सनई कै खटिया,उबहनि
दरवाजे कै लाठी गायब !
बाबा कै बकुली औ धोती
अजिया केरि उघन्नी गायब,
लरिकन केर करगदा,कंठा
बिटियन कै बिछिया भै गायब !
नानी केरि कहानी गायब,
लोटिया अउर करइहा गायब,
अम्मा कै दुधहंडि औ भठिया,
बप्पा कै रामायन गायब !
आम्बन ते अम्बिया हैं गायब
चूल्हे-भूंजा ह्वारा गायब,
सोहरै,बनरा,गारी गावै-
वाली सुघर मेहेरिया गायब !
पइसन के आगे अब भइया
रिश्ते-नाते,रस्ते गायब,
शहर किहे हलकान बहुत
अब तो चैन हुँवौं ते गायब !
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गारा-माटी के घर गायब
कुल्हरी, समसी, लोढ़वा गायब,
लढ़िहा, लग्घी, बैल कै गोईं
मुसका, चरही, पगही गायब !
ग्वाबरु, गोलई, टोकनी गायब
मूड़े कै वह गोड़री गायब,
अब कइसे दिन फिरिहैं सबके,
घूरे केरि रिहाइश गायब !
चारा-सानी, चोकरा गायब,
पड़वा, पड़िया, लैरा गायब ,
ख्यातन ते, खरिहानन ते
सीला-गल्ला, पैरा गायब !
दुलहिनि, पाहुन, बालम गायब
जनवासे ठंढाई गायब,
दुलहा, सरहज, नेगु-कल्यावा
लरिकन कै बरतउनी गायब !
भौजी संग ठिठोली गायब
बुआ चिढ़ाती हरदम, गायब ,
कब तक मनई बचा रहत है
चिट्ठी, पान-सुपारी गायब !
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कुआँ पर के पुरवाही गायब
बैलन से हरवाही गायब
सरपत, नरकुल, छपरा गायब
माटी नरिया खपरा गायब..
गोजई काकुन बजरा गायब
हँड़िया कुचरी खखरा गायब
भौरा भरता सांवा गायब
करई परई आंवा गायब
यह कथा मैथिली के एक बड़े कवि, गीतकार और फिल्मकार रवींद्रनाथ ठाकुर की है, जिन्हें हाल में ही प्रबोध सम्मान दिये जाने की घोषणा हुई है. जिंदगी भर महानगरीय दुनिया में संघर्ष करने के बाद जीवन संध्या गुजारने इन दिनों वे अपने गांव धमदाहा में रह रहे हैं, कहते गर्व होता है यह मेरा भी गांव है. रवींद्र को गांव के लोग लड्डू बाबू कहकर पुकारते हैं और साहित्य रसिक मैथिली का मोदक कहते हैं. उनके गीतों का माधुर्य ऐसा है कि कई दफा लोग कहते हैं विद्यापति के बाद मैथिली में कोई मिठास लेकर आया तो वह रवींद्र ही हैं. बहुत जल्द उनकी पूरी रचनावली प्रकाशित होने वाली है. वह क्यों गांव में रहते हैं और उनके लिए गांव की क्या अहमियत है इस मसले पर उन्हें इस आलेख में खुल कर अपने विचार रखे हैं. आपके लिए...
बासुमित्र
प्रबोध सम्मान से सम्मानित होने वाले मैथिली के साहित्यकार, गीतकार, फिल्मकार रवींद्रनाथ ठाकुर महानगरीय राजनीति से दूर अपने गांव धमदाहा में साहित्य साधना में लीन हैं. रवीन्द्र के लिए गांव ही उनकी साधना स्थली है. जहां गावँ में रमे रवीन्द्र साहित्य की नई पारी में जुटे हैं, वहीँ उनके गांव के लोग भी उनकी साहित्य साधना में उनका सहयोग कर रहे हैं. उनके पास दोस्त-यारों से लेकर लोगों की भीड़ लगी रहती है. गांव का जिक्र आते ही रवीन्द्र कहते हैं की उनकी प्रेरणा का स्त्रोत गांव ही है. अगर गांव न होता तो लेखक ही नहीं होता. गांव आकर मानो मैं अपने आप को जीने लगता हूँ. एक तो डीह का मोह ऊपर से लेखक कैसे महानगर में बस सकता. गांव ही लिखने की ऊर्जा देती है और गांव ही आपके लिए एक ऐसा संसाधन है जहां आप अपने आप को तराश सकते हैं. इसलिए गांव ही आकर बस गया. या यूं कहें बढ़ती उम्र में अपनी दूसरी पारी की तैयारी गांव आकर कर रहा हूँ. यह कहना है मैथिली के संगीतकार, लेखक, नाटककार औऱ फिल्मकार रवीन्द्र नाथ ठाकुर का.
माँ के कारण गांव लौटा
सालों महानगरीय जीवन जी चुके रवीन्द्र बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें गांव प्रिय लगता था. औद्योगीकरण ने हम सब को अलग-अलग बाँट दिया. आजीविका के कारण सब घर से दूर होते चले गये. माँ अकेली गांव में रहती थी. कई बार हम लोगों ने अपने साथ माँ को ले जाना चाहा. पर माँ कहती थी मेरे जाने के बाद अगर दरवाजे पर कोई भिखारी आया और उसे भीख नहीं मिली तो मैं ऊपरवाले को क्या मुंह दिखाउंगी. मेरी माँ डीह और मर्यादा के कारण हमेशा से गावँ में रही. अब माँ के गुजर जाने के बाद मैंने गांव में ही बसने का फैसला किया.
आज भी हैं गांव के दुलारे
वैसे कहूं तो गावँ में लोगों ने हमेशा से काफी ज्यादा सम्मान दिया. उनको मुझ पर पूरा भरोसा था. जब भी कोई किताब आती थी या जब भी गांव जाना होता था तो लोग काफी उत्साह से मिलते. वही प्यार आज भी बना हुआ है. सम्मान मिलने की जितनी ख़ुशी गांव में रह कर हो रही है, उतनी ख़ुशी दिल्ली या पटना में रह कर नहीं मिल सकती थी.
बदलते गांव को देख कर होता है दुःख
मेरे लिए विकास का मतलब यह नहीं है कि अपनी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर लें. आज गांव न तो शहर बन पाया और न ही गांव के मूल रूप में बचा है, बल्कि यूं कहें कि आधुनिक बनने के चक्कर में शहर के सारे दुर्गुणों को अपने में समेट चुका है. अपने गांव में लड्डू बाबू के नाम से जाने जानेवाले रवीन्द्र के बाल सखा रह चुके हरिवंश झा बताते हैं कि बचपन से ही इनको कविता, नाटक, गीत का शौक था. आज इनके इस मुकाम को देख कर काफी ख़ुशी मिलती है. यह हमारे समाज के लिए सम्मान की बात है. वहीँ गावँ के युवा मनोज झा बताते हैं की अगर यह आज किसी महानगर में बसे होते तो इनको और ज्यादा सम्मान मिला होता. गावँ के समाजसेवी और उनके हमनाम रवीन्द्र जी बताते हैं की कई बार जिन्हें नहीं पता है वह मुझे ही लेखक समझ बैठते हैं. मैथिली साहित्य के महान लेखक हमारे गावँ के हैं और जिस सादगी से वह रहते हैं, उन्हें देख कर आप सहज अनुमान नहीं लगा सकते हैं कि वह किस मुकाम पर पहुँच चुके हैं.