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सोमवार, 19 जनवरी 2015

रिबनवाली लड़की नहीं थीं


मिथिलेश कुमार राय
प्रतीकात्मक तसवीर
वसंत आ रहा था. खेतों में हरे-हरे गेहूं के पौधे और पीले-पीले सरसों के फूल पछिया हवा के संग झूम रहे थे. खेत की मेड़ पर कुछ लड़कियां विचर रही थीं. सभी लड़कियों ने दो चोटी बांध रखी थीं. गूंथे हुए बालों में हरे पीले नीले लाल रिबन से फूल बने हुए थे. खेत फूलमय हो गया था. चिड़िया हवा में गोते लगा रही थीं. लेकिन आँख खुली तो सबकुछ था,रिबनवाली लड़की नहीं थीं. मैं 17 साल पीछे लौटा तो मेरी बंद आँखों के पार रंग-बिरंगे रिबन से अपने बालों को बांधी कई लड़कियां खिलखिला रही थीं. दोपहर को मनिहारावाला मिल गया. मैंने उसे टोका. पूछा कि रिबन है... तो वह ठठाकर हँस पड़ा. साईकिल रोककर उसने बताया कि अब लड़कियों ने बाल गूंथने की क्रिया पर लगाम लगा दिया है. बाल एक क्लिप या रबड़-बैंड के साथ खुले-खुले उड़ते रहते हैं.
मनिहारावाले ने भी रिबन से बाल बाँधने वाली लड़कियों को कई वर्षों से नहीं देखा था. वह इतने वर्षों से मनिहारा का सामान बेच रहा है कभी किसी ने रिबन के बारे मेँ उस से नहीं पूछा. उसने मुझे बताया कि रिबन से बाल बाँधने वाली लड़कियां अब सिर्फ बीत गये दृश्यों में मिलेंगी.
इस बात का जिक्र मैंने अपनी बड़ी बहन से किया तो वह भी खिलखिलाने लगीं. बताया कि बचपन में जब वो मेला-ठेला जाने लगती थीं, माँ उसके बालोँ को गूंथकर लाल रिबन से एक फूल बनाती थी. कितना अच्छा लगता था. तब सारी लड़कियां रिबन का ही इस्तेमाल किया करती थीं. स्कूल आनेवाली हरेक लड़कियों के बालों में एक फूल खिला होता था जो रिबन से बना होता था. बहन की बात सुनकर माँ को भी अपना बचपन याद आ गया. उसने बताया कि तब क्लिप और रबड़-बैंड जैसा कुछ भी नहीं था. बाल बांधने के लिए सिर्फ रिबन था. माँ ने अपना पुराना संदूक खोला. बहुत ढ़ूंढ़ा. लेकिन रिबन कहीं नहीं मिला. अब माँ भी रबड़ बैँड लगाकर अपने बालों को संवारती हैं. रिबन कब कहां खो गया, उन्हें भी कुछ याद नहीं.
शाम को चाय की दुकान पर अपने एक पत्रकार साथी से पूछा तो उन्होंने याद दिलाया कि रिबन को उद्घाटन में कैंची से काटने के लिए जब्त कर लिया गया है!

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

कुहरे में डूबा गाँव


डॉ. योगेंद्र ने भरोसा दिलाया है कि वे किसी दिन पगडंडी के लिए अपने मन में बसे गांव की कहानी लिखेंगे. हमलोग इंतजार कर रहे हैं. फिलहाल उनकी एक कविता उनकी साइट पर मिली है. उठा कर ले आया हूं, आपके लिए.... देखिये तो गांव की कितनी जीवंत तसवीर खींची गयी है...
एक
कुहरा भरा दिन
गाँव-घर डूबे हुए
पेड़ों पर उग आयी है-एक सफ़ेद दुनिया।
इस दुनिया से कभी-कभी एक पक्षी
आसमान में पंख फैलाता है।
किसान हल को कंधे पर रखे
खेतों की ओर चले जा रहे हैं।
एक बस लगी है अभी
जिसमें लद रहे हैं मजदूर।
जा रहे हैं शहर
किसी चौराहे पर खड़े होंगे
और इंतज़ार करेंगे किसी खरीदार का।
दो
औरतें नाद में सानी लगा रही है
लड़कियां ठंड से सुसया रही हैं
बकरियों को हाँकते हुए
कुहरे में ओझल हो रही हैं।
कुछ लड़के चूड़ा -चक्की जेब में डाल
शिवाले पहुँच गए हैं और गुल्ली खेलने को हैं तैयार।
धान की पांतन भीगी हुई हैं
किसान इंतज़ार करेंगे सूरज देवता का।
मुशहर टोले से क्यों आवाज आ रही है
रोने का?
कुछ अघटित घटा है।
दुख की घड़ी है।
तीन
कुहरे से ढंके गाँव से
कई आवाजें फूटती हैं
गम है,लेकिन ठहाके भी हैं ।
झोपड़ी है तो महल भी हैं।
पागल-सा आदमी घूमता है
तो गाडियाँ भी दौड़ती हैं।
कोई मालिक है तो नौकर भी है।
गाँव अभी शहर नहीं बन पाया
लेकिन शहर की आदतें
हर घर में फैल गयी हैं।
कोई यहाँ मस्त है
तो कोई पस्त है।

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

जानकीपुल: गाँव, विकास और रंगमंच

जानकीपुल: गाँव, विकास और रंगमंच: गाँव के रंगमंच को लेकर एक बड़ा रोचक और दुर्लभ किस्म का संस्मरण लिखा है युवा रंग समीक्षक अमितेश कुमार ने. लम्बे लेख का एक छोटा सा अंश प्रस्तुत है. आप भी आनंद लीजिये- मॉडरेटर जानकीपुल
शुरूआत हुई थी 2005 में. अपने गांव वाले घर में चोरी होने के कारण ‘बगहा’ (उत्तरप्रदेश और नेपाल से सटा हुआ जो सदानीरा नारायणी नदी जिसे गंडक भी कहते हैं कि किनारे बसा हुआ. एक जमाने में मिनी चंबल के नाम से मशहूर) से अचानक गांव ‘पजिअरवा’ जाना पड़ा. यह भारत के बिहार प्रांत के मोतिहारी जिले के सुगौली प्रखंड में स्थित है जिसमें ग्रामपंचायत भी है. गाँव के लोगों को गर्व है कि पंचायत पजिअरवा के नाम से है. मतदाताओं की अधिकता और तीन में से दो मौको पर बहुलांश की एकजुटता की वज़ह से पंचायती राज की बहाली के बाद एक निवर्तमान मुखिया और एक वर्तमान मुखिया का ताल्‍लुक़ गाँव से ही है. गाँव से हाइवे और रेलवे लाइन छः किलोमीटर की दूरी पर है. बचपन में ट्रेन पकड़ने के लिये नजदीकी हाल्ट धरमिनिया पैदल जाना आना पड़ता था, कभी-कभार बैलगाड़ी रहती. बरसात के चार महीने गाँव टापू बन जाता. कच्ची सड़कों और धान रोपने के लिये तैयार किये खेतों के बीच का फ़र्क़ मिट जाता था. सड़कें अलबत्ता खेतों से ऊंची थीं. जब कभी कोई दुस्साहसी वाहन उसमें फँसता तब उसे निकालना या निकलवाना एक सामाजिक कवायद होती. इसके लिये वाहन बाहर से बुलवाया जाता क्योंकि गांव में एक भी नहीं था. यह वाहन आम तौर पर ट्रैक्टर होता. जीप और उस जैसी चार पहिये वाहन का आगमन दुर्लभ था इसलिये उनका आगमन बच्चों के लिये जश्न था. वाहन की उड़ाई धूल लेने के लिये उसके पीछे देर तक दौड़ते थे.
ट्रैक्टर पर सवार ड्राइवर को कोई भी और कुछ भी सलाह दे सकता था. जैसे दांया कर, हाईड्रोलिक उठाव, हेने काट, होने काट आदि. बच्चे इस तमाशे के भी मुख्य दर्शक थे और युवक हाथ में कुदाल ले कर पांक काटते, पसीना बहाते हुए किसी तरह ट्रैक्टर को निकाल लेते. कच्ची से खड़ंजा, और खड़ंजा से पक्की सड़क कोलतार वाली बन गई है. कुछ गलियों में ढलुआ सड़कें बन गई है जिसे पीसीसी कहते है. होश के गुजरे दो दशक में मेरे द्वारा देखा गया ‘विकास’ यही है. स्कूल, कालेज, की बात मत पूछिये. जहाँ आवागमन का एकमात्र साधन पैदल था, वहाँ तांगा और जीप चलने लगे. धीरे-धीरे टैम्पो तांगे को विस्थापित कर रहे हैं. गाँव के ब्रह्म स्थान से ही जीप या टैम्पो पर बैठकर आप देश-दुनिया की यात्रा पर निकल सकते हैं. बाकी मोबाईल तो घर-घर में है ही. मुआ बिजली भी कुछ दिनों के लिये आयी लेकिन अपने पीछे दो जले ट्रांसफ़रमर छोड़कर दो सालों तक लापता हो गई. फिर अचानक एक दिन लौटी. लोकसभा चुनावों की हवा में ट्रांसफरमर बदला, तार बदले, लेकिन इस आंधी का क्या करे जिसने अचानक आ कर कई खंभे उखाड़ दिये.
घर में हुई चोरी की तफ़्तीश के लिए कई रास्तों का सहारा लिया गया था. पुलिसिया रास्ता भी. इन्क्वायरी के लिये आये जमादार साहब की दो हज़ारी की डिमांड को मैंने आदर्शवाद से व्यवहारवाद की धरातल पर उतर कर मोलतोल के उपरांत पांच सौ में निपटाया.
‘गाड़ी का तेल और पुलिस पार्टी में पांच आदमी का खरचा इतना में कैसे होगा जी?’
अरे सर! मेरेयहां चोरी हुआ है...पापा नहीं हैं ...इतना ही है घर में ... कहां से लाएं ...
इंक्वायरी की औपचारिकता के लिये आये इस दल को देखनेके लिये बिना टिकट दर्शकों की भीड़ जमा हो गई थी. और मेरे द्वारा की गई कमी की भरपाई करने के लिये वे जाते-जाते लोगों के छान-छप्पर से कोहंड़ा- भथुआ (जिससे मुरब्बा या पेठा बनता है) लेते गये. दूसरा रास्ता था ओझा-गुनी वाला. एक साथ ऐसे कितने ओझाओं की ख्याति हमारे पास पहुँच गई जो चोरी करने वाले का एक दम से नाम बता देते थे. इसमें सबसे गुप्त सुझाव देने वाले पड़ोस की एक महिला ने चुपचाप रह कर उपाय करने के लिये कहा और इसके लिये मुझे ‘प्रेम’ की सहायता लेनी थी. प्रेम गाँव में वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी है. गाँव में नाटक, अष्टयाम, अराधना, कीर्तन, होरी इत्‍यादि में उनकी उपस्थिति लाजिमी होती है. वे सधे गायक, पके अभिनेता, जमे नाल वादक और तपे-तपाए संगठनकर्ता हैं. उनको बुलाने के लिये उनके घर गया रात में, तो पता चला वो पड़ोस में हैं. वहाँ पहुँचा तो देखा कुछ लोग इकठ्ठा थे. वहाँ नाटक की भूमिकाओं का बँटवारा हो रहा था और नाटक खेलना तय हो गया था. मैंने प्रेम भाई को बाहर बुला कर अपनी बात कही. उन्होंने भरोसा दिया कि कल सुबह वो मेरे साथ चलेंगे. फिर मेरी बुलाहट अंदर हुई. मुझे भी नाटक में एक भूमिका करने के लिए कहा गया. पहला प्रस्ताव था नायिका का, गाँव के नाटकों में अभी भी पुरुष ही स्त्री की भूमिका करते हैं. इसके लिए लड़कों को मनाना मशक्कत भरा काम होता है. लड़को को भी अभिभावक का डर सताता है, जो बेटों को बेटी बनने के लिये घर से निकालने की धमकी तक देते हैं. गाँव में कई बार ऐसा भी हो चुका था कि पितृ-भय के चलते पुत्र इच्छा रहते भी नायिका की भूमिका नहीं निभा सके थे. आपात स्थिति में किसी और को भूमिका करनी पड़ी थी. मैंने कहा कि इस मनःस्थिति में मैं नायिका का किरदार नहीं कर सकता. लेकिन एक छोटा रोल मुझे दे दीजिये, मैं कर लूँगा. इस तरह नाटक मंडली में मेरा प्रवेश हुआ. मुझे एक फ़ौजी की भूमिका मिली थी जो मेरी काया के अनुकूल नहीं थी. दिन में मैं घर के काम में उलझा रहता और रात में रिहर्सल करता. चोरी की वज़ह से हो रहे तनाव से निबटने का यह एक उपचार भी था.
मेरे गाँव में मुख्यतः पांच टोलें यानी मोहल्ले हैं. एक पुर्वारी टोला, दूसरा पछियारी टोला, तीसरा पोखरा पर, चौथे को केवल टोला कहते हैं और पांचवा बऊधा टोला है. पछियारी टोले में नाटक खेलने वाली दो टीम थी. हमारे टोले के लड़के उसी दो टीमों में अपने संघत के हिसाब से नाटक खेलते थे. उस टोले के लोग हमारे टोले को थोड़ा कमतर मानते हैं और यह पूर्वग्रह उस टोले में निवास करने वाली सभी जातियों का हैं. आखिर गाँव के भूतपूर्व सामंत और ‘दर’बार का वह टोला था, जिसमें एक पोस्ट ऑफ़िस था, पुस्तकालय था, स्कूल था, मंदिर था, माई स्थान था, स्वतंत्रता सेनानी थे, पान दुकानदार थे, पत्रकार थे और एक पूर्वमुखिया भी. हमारे टोले में संपन्न, शिक्षित, नौकरीपेशा लोगों की संख्या कम थी या नहीं के बराबर थी. शक्ति प्रतिष्ठान भी नहीं था, ले दे कर एक मसजिद और कुछ आटा पिसने की चक्कियाँ थी. उस टोले की टीम जब भी नाटक खेलती और पात्र बंटवारा करती तब हमारे टोले के लड़कों को कमतर रोल दिया जाता. अधिकतर नायिका का, नौकर का,बुढे का या अन्‍य हास्य किरदारों का. इस उपेक्षा के प्रतिशोध में टोले के लड़के किताब उस टोले से ले कर आये थे और बुनाद की दुकान पर तराजु छू कर कसम खाई थी कि नाटक होगा. बुनाद की शिक्षा नहीं के बराबर हुई है फिर भी बुलंदआवाज़, साफ़ उच्चारण के साथ भूमिका को याद करने की उसमें जबरदस्‍त क्षमता है. नाटक खेलने की उसकी ललक ने सबको प्रेरित किया था. कसम खा ली गई थी, रोल बंट चुके थे, रिहर्सल शुरू हो गई थी, जो बुनाद की ही झोपड़ी में होती थी. कान से कम सुनने वाली उसकी मां को आखिर क्या फ़र्क पड़ता!
उस वर्ष हम जब चँदा माँगने के लिए गाँव में निकलते तो लोग हमें हतोत्साहित करते थे तो हम तर्क देते कि हम अठारह पात्र हैं और हमारे घरवाले जो कम से कम सौ होंगे हमारा नाटक देखेंगे. अतः हमारे पास दर्शक तो हैं. गाँव में नाट्य दल का नाम रखने का रिवाज़ था. जिसमें ‘नवयुक नाट्य कला परिषद’ के आगे कोई एक नाम जोड़ दिया जाता था. हमने इस परंपरा को तोड़ के अपने दल का नाम रखा ‘अभिरंग कला परिषद’, जिसमें अभिरंग का आशय था अभिनव रंगमंच. नाटक हुआ और क्या जबरदस्त हुआ! ‘कश्मीर हमारा है’ उर्फ़ ‘आतंकवाद को मिटा डालो’.
हमारा गांव मुख्यतः दो टोलों के बीच बंटा हुआ है. गांव में पहले नाटक दोनों टोले के बीचो बीच हुआ करता था, जब वकील बाबा उर्फ़ जयनाथ मिश्र नाटक दल के मुखिया हुआ करते थे. गिरधारी राऊत के घर के आगे, जो गांव के ठीक बीचो बीच था, बहुत बड़ा दालान था. अच्छी खासी जगह थी. बेटों से पोतों के बीच बंटते बंटते अब उस जगह पर इतने घर बन गये है कि जगह सिमटा हुआ दिखाई देता है. लेकिन जमीन देख कर अंदाजा हो जोता है कि नाटकों के लिये कितनी अच्छी जगह रही होगी. वकील बाबा, शायद ओकिल बाबा उच्चारण ठीक होगा, हमारे गांव के आदि नटकिया हैं. उनके बारे में लिखा जाए तो अलग से एक अध्याय लिखना पड़ेगा. मुख्तसर सा परिचय ये है कि पेशे से प्राध्यापक, छोटी कद के हाजिरजवाब, स्फ़ूर्ति से भरे और पंचलाईन के व्यंग्यों के उस्ताद ओकील बाबा गांव में नाटक शुरू करने वाले आरंभिक लोगों में से एक थे. उनकी सक्रियता नाटक को लेकर आज भी बनी रहती है. उनका कहना है कि नचनिया जब नगाड़ा के ताल सुन ली त बैछौने पर काहे ना लेकिन चुतड़ डोलइबे करी. नचनिया से मतलब अभिनेता से ही रहता है. ओकील बाबा के बाद मेरे पिताजी यानी प्रोफ़ेसर साहब के नेतृत्व में नाटक होने लगा तो उन्होंने कभी कभी जगह का बदलाव भी कर दिया जैसे कि हमारे दरवाजे पर ‘जय परशुराम’ हुआ था। जिसमें परशुराम की भूमिका निभाने वाले ने इतनी शिद्दत से अभिनय किया कि आज भी लोग याद करते हैं कि ‘गोविंद जी पशुराम बनलें तो खड़ाऊं के थाप से चौकी तुड़ देले..हां त गज़ब नु रोल कईलक. यारवा!’ . मेरे पिताजी के बाद कमान अमरचंद्र मिश्र ने संभाली तो नाटक को वो अपने टोले में ले गये और अनिल काका के दरवाजे पर, जो गांव के स्कूल के पास है, नाटक होने लगा. उस टोले की टीम भी तभी दो फाड़ हुई जब भूमिका नहीं मिलने की वज़ह से एक रंगकर्मी ने दल तोड़ के कुछ लोगों को तोड़कर और कुछ नये लोगों जिन्हें मौका नहीं मिलता था को जोड़कर अपना दल बना के नाटक खेला. विवाद की तीव्रता और प्रतिद्वंदिता इतनी गहरी हो गई थी कि एक ही नाटक ‘गुनाहों का देवता’ को दोनों दलों ने एक दिन के अंतराल पर खेल दिया. लेकिन अंततः दोनों दल बिखर गया. नाटक मंडलियां केवल मेरे गांव में नहीं बिखर रही थी, जिन गांवों में नाटक होता था, जहां से नाटक के लिये सामग्री आती थी वहां भी खस्ताहाल हो रहा था. बिहार में यही दौर था जब बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप में थी और बड़ी संख्या में आबादी पलायन करने को मजबूर हो गई. गांव में इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संचालन का जिम्मा जिन युवकों का था वो रोजगार की तलाश में लग गये. सरकारी नौकरी दुर्लभ हो गई जो बहुत परिश्रम से मिलती थी और जिसमें अभिभावक के धन का निवेश भी चाहिये था. जिनके पास यह नहीं था वह निजी नौकरियों की खोज में निकल गये. ऐसे में नाटकों को बंद होना ही था.
'मंतव्य' से साभार

बथुआ फिरी है, मगर सरसों, धनिया, खेसारी पर टैक्स है...


इन दिनों गांव से लेकर शहर तक साग का मौसम है. थाली में एक साग न हो तो भोजन प्रेमियों का मन नहीं मानता. शहरों में तो अब मंडी चले जाइये, जो चाहे वही साग उपलब्ध है, मगर गांव में साग हासिल करने के लिए खेत-खेत भटकना पड़ता है. साग का प्रेम सबसे अधिक महिलाओं को होता है, खास तौर पर नवयुवतियों को. वे इस मौसम में पूरे देश खेतों में भटकती रहती हैं, साग पाने के लिए. इससे उन्हें साग तो मिल ही जाता है, लड़कियों की रंग बिरंगी पोशाकें और उन्मुक्त हंसी की वजह से गांवों में बेमौसम बसंत आ जाता है. इसी नजारे को शब्दों में गूंथा है मिथिलेश कुमार राय ने... पढ़कर बताइये कैसा बना है.
हां, तसवीर सांकेतिक है...
मिथिलेश कुमार राय
इन दिनों स्कूलों में छुट्टी के बाद खेतों में लड़कियों का राज हो जाता है. सब्जियों के इस मौसम में गेहूं के खेतों में उगे बथुआ साग और उसके बगल के खेतों में लहलहाते खेसारी साग, सरसों साग उन्हें खूब-खूब आकर्षित करती हैं. स्कूल से आने के बाद लड़कियां खेतों के बीहड़ में उतरने के लिए हड़बड़ाई रहती हैं. कभी-कभी इस झुंड में कोई नव विवाहिता या कोई बुजुर्ग महिलाएं भी शामिल हो जाती हैं. लेकिन जिस दिन ऐसा होता है उस दिन लड़कियों की मस्ती पर असर पड़ जाता है. पैरों में रस्सी जैसा कुछ उलझ जाता है. क्योंकि वे इन्हें नहर के उस पार नहीं जाने देतीं. चौकीदार बन जाती हैं और आँखें तरेरने लगती हैं. गाँव की भी पाबंदी है. साग ही तो तोड़ने जाना है तो इन खेतों में क्या साग की कमी है कि नहर के पार जाएगी. खबरदार. नहर से इधर ही तोड़कर वापस आ जाएं घर! जबकि लड़कियां पैरों की रस्सी खोल खूब कुलांचे भरना चाहती हैं. नहर के उस पार तक. उस पार जहां तक नजर जाती हैं सिर्फ हरियाली ही हरियाली नजर आती हैं. सुरसरि तक. आँखों को खूब सकून मिलता है. मन को कितनी शांति मिलती है. जोरजोर से हंसो. खूब चिल्लाओ. कोई टोकनेवाला नहीं. अब तो सरसों में भी फूल आने लगे हैं. कितना अच्छा लगता है.
गेहूं के खेतों में दर्जन-दर्जन भर लड़कियां उतरकर बथुआ का साग खोंटने लगी हैं. तभी किसी ने कुछ ऐसा कहा कि हंसी ने बाँध तोड़ दी. वातावरण खिलखिलाने लगा. लेकिन
बुढ़िया ने टोक दिया तो ठहाके पर लगाम लग गयी. यही नहीं सुहाता.
बथुआ खोटते-खोटते लड़कियाँ इधर-उधर देखती हैं और बगल के खेसारी के खेत में छलांग लगा देती हैं. हाथ बढ़ाकर थोड़ा सा धनिया नोच लेती हैं. सरसों का पत्ता भी एक-आध मुट्ठी तोड़ लेती हैं. लेकिन तभी दूर से एक आवाज आती है. यह खेत मालिक की आवाज है. जिसे सुनकर लड़कियाँ दौड़कर फिर बथुआ खोंटने बैठ जाती है. बथुआ एकदम फ्री है. खेसारी, धनिया, सरसों पर टैक्स लगा है जैसे! लेकिन आँख बचाकर खोटने से कौन रोक सकता है भला! खोंइछा में नीचे खेसारी और ऊपर बथुआ. पकड़े जाने पर दूर से खोंइछा में पड़ा बथुआ दिखाकर खिलखिलाती हुई घर की ओर दुलक पड़ती हैं.
बथुआ चंगेरा में डालकर घर के छप्पर पर रात भर शीत में और खेसारी पकाकर सुबह तक बासी होने के लिए छोड़ दिया गया है. बासी खेसारी और अदरकवाला बथुआ का कोई जवाब नहीं. ऊपर से धनिया की चटनी. फिर भात हो या रोटी-पेट भर जाता है, मन नहीं भरता !

बुधवार, 7 जनवरी 2015

कहाँ गए वो गाँव


संतोष त्रिवेदी जी ने इन दिनों गांव पर लिखी अपनी पुरानी कविता अपने फेसबुक वाल पर डाली है, वहीं से इसे उठा लाया हैं. पहली दो कविताएं उनकी है. तीसरी युवा मन्शेष ने उनसे प्रभावित होकर लिखी है... पढिये औऱ आनंद लीजिये...
1
गाँव, गिद्ध, गौरेया गायब
कोठरी, डेहरी, कथरी गायब,
अब तो सूखे साख खड़े हैं
कुआँ ते हैं पनिहारिन गायब !
गाँव किनारे वाला पीपल,
बरगद और लसोंहड़ा गायब,
मूंज, सनई कै खटिया,उबहनि
दरवाजे कै लाठी गायब !
बाबा कै बकुली औ धोती
अजिया केरि उघन्नी गायब,
लरिकन केर करगदा,कंठा
बिटियन कै बिछिया भै गायब !
नानी केरि कहानी गायब,
लोटिया अउर करइहा गायब,
अम्मा कै दुधहंडि औ भठिया,
बप्पा कै रामायन गायब !
आम्बन ते अम्बिया हैं गायब
चूल्हे-भूंजा ह्वारा गायब,
सोहरै,बनरा,गारी गावै-
वाली सुघर मेहेरिया गायब !
पइसन के आगे अब भइया
रिश्ते-नाते,रस्ते गायब,
शहर किहे हलकान बहुत
अब तो चैन हुँवौं ते गायब !
2
गारा-माटी के घर गायब
कुल्हरी, समसी, लोढ़वा गायब,
लढ़िहा, लग्घी, बैल कै गोईं
मुसका, चरही, पगही गायब !
ग्वाबरु, गोलई, टोकनी गायब
मूड़े कै वह गोड़री गायब,
अब कइसे दिन फिरिहैं सबके,
घूरे केरि रिहाइश गायब !
चारा-सानी, चोकरा गायब,
पड़वा, पड़िया, लैरा गायब ,
ख्यातन ते, खरिहानन ते
सीला-गल्ला, पैरा गायब !
दुलहिनि, पाहुन, बालम गायब
जनवासे ठंढाई गायब,
दुलहा, सरहज, नेगु-कल्यावा
लरिकन कै बरतउनी गायब !
भौजी संग ठिठोली गायब
बुआ चिढ़ाती हरदम, गायब ,
कब तक मनई बचा रहत है
चिट्ठी, पान-सुपारी गायब !
3
कुआँ पर के पुरवाही गायब
बैलन से हरवाही गायब
सरपत, नरकुल, छपरा गायब
माटी नरिया खपरा गायब..
गोजई काकुन बजरा गायब
हँड़िया कुचरी खखरा गायब
भौरा भरता सांवा गायब
करई परई आंवा गायब

गांव से ही तो मिलता है साहित्य का खाद-पानी - रवींद्र नाथ ठाकुर


यह कथा मैथिली के एक बड़े कवि, गीतकार और फिल्मकार रवींद्रनाथ ठाकुर की है, जिन्हें हाल में ही प्रबोध सम्मान दिये जाने की घोषणा हुई है. जिंदगी भर महानगरीय दुनिया में संघर्ष करने के बाद जीवन संध्या गुजारने इन दिनों वे अपने गांव धमदाहा में रह रहे हैं, कहते गर्व होता है यह मेरा भी गांव है. रवींद्र को गांव के लोग लड्डू बाबू कहकर पुकारते हैं और साहित्य रसिक मैथिली का मोदक कहते हैं. उनके गीतों का माधुर्य ऐसा है कि कई दफा लोग कहते हैं विद्यापति के बाद मैथिली में कोई मिठास लेकर आया तो वह रवींद्र ही हैं. बहुत जल्द उनकी पूरी रचनावली प्रकाशित होने वाली है. वह क्यों गांव में रहते हैं और उनके लिए गांव की क्या अहमियत है इस मसले पर उन्हें इस आलेख में खुल कर अपने विचार रखे हैं. आपके लिए...
बासुमित्र
प्रबोध सम्मान से सम्मानित होने वाले मैथिली के साहित्यकार, गीतकार, फिल्मकार रवींद्रनाथ ठाकुर महानगरीय राजनीति से दूर अपने गांव धमदाहा में साहित्य साधना में लीन हैं. रवीन्द्र के लिए गांव ही उनकी साधना स्थली है. जहां गावँ में रमे रवीन्द्र साहित्य की नई पारी में जुटे हैं, वहीँ उनके गांव के लोग भी उनकी साहित्य साधना में उनका सहयोग कर रहे हैं. उनके पास दोस्त-यारों से लेकर लोगों की भीड़ लगी रहती है. गांव का जिक्र आते ही रवीन्द्र कहते हैं की उनकी प्रेरणा का स्त्रोत गांव ही है. अगर गांव न होता तो लेखक ही नहीं होता. गांव आकर मानो मैं अपने आप को जीने लगता हूँ. एक तो डीह का मोह ऊपर से लेखक कैसे महानगर में बस सकता. गांव ही लिखने की ऊर्जा देती है और गांव ही आपके लिए एक ऐसा संसाधन है जहां आप अपने आप को तराश सकते हैं. इसलिए गांव ही आकर बस गया. या यूं कहें बढ़ती उम्र में अपनी दूसरी पारी की तैयारी गांव आकर कर रहा हूँ. यह कहना है मैथिली के संगीतकार, लेखक, नाटककार औऱ फिल्मकार रवीन्द्र नाथ ठाकुर का.
माँ के कारण गांव लौटा
सालों महानगरीय जीवन जी चुके रवीन्द्र बताते हैं कि बचपन से ही उन्हें गांव प्रिय लगता था. औद्योगीकरण ने हम सब को अलग-अलग बाँट दिया. आजीविका के कारण सब घर से दूर होते चले गये. माँ अकेली गांव में रहती थी. कई बार हम लोगों ने अपने साथ माँ को ले जाना चाहा. पर माँ कहती थी मेरे जाने के बाद अगर दरवाजे पर कोई भिखारी आया और उसे भीख नहीं मिली तो मैं ऊपरवाले को क्या मुंह दिखाउंगी. मेरी माँ डीह और मर्यादा के कारण हमेशा से गावँ में रही. अब माँ के गुजर जाने के बाद मैंने गांव में ही बसने का फैसला किया.
आज भी हैं गांव के दुलारे
वैसे कहूं तो गावँ में लोगों ने हमेशा से काफी ज्यादा सम्मान दिया. उनको मुझ पर पूरा भरोसा था. जब भी कोई किताब आती थी या जब भी गांव जाना होता था तो लोग काफी उत्साह से मिलते. वही प्यार आज भी बना हुआ है. सम्मान मिलने की जितनी ख़ुशी गांव में रह कर हो रही है, उतनी ख़ुशी दिल्ली या पटना में रह कर नहीं मिल सकती थी.
बदलते गांव को देख कर होता है दुःख
मेरे लिए विकास का मतलब यह नहीं है कि अपनी सभ्यता और संस्कृति को नष्ट कर लें. आज गांव न तो शहर बन पाया और न ही गांव के मूल रूप में बचा है, बल्कि यूं कहें कि आधुनिक बनने के चक्कर में शहर के सारे दुर्गुणों को अपने में समेट चुका है. अपने गांव में लड्डू बाबू के नाम से जाने जानेवाले रवीन्द्र के बाल सखा रह चुके हरिवंश झा बताते हैं कि बचपन से ही इनको कविता, नाटक, गीत का शौक था. आज इनके इस मुकाम को देख कर काफी ख़ुशी मिलती है. यह हमारे समाज के लिए सम्मान की बात है. वहीँ गावँ के युवा मनोज झा बताते हैं की अगर यह आज किसी महानगर में बसे होते तो इनको और ज्यादा सम्मान मिला होता. गावँ के समाजसेवी और उनके हमनाम रवीन्द्र जी बताते हैं की कई बार जिन्हें नहीं पता है वह मुझे ही लेखक समझ बैठते हैं. मैथिली साहित्य के महान लेखक हमारे गावँ के हैं और जिस सादगी से वह रहते हैं, उन्हें देख कर आप सहज अनुमान नहीं लगा सकते हैं कि वह किस मुकाम पर पहुँच चुके हैं.