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बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

हल जोतना चाहते हैं या एसी ऑफिस में बैठना... :)


Rashmi Ravija
आज कहीं एक मजेदार तर्क पढ़ा..."आप खेत में हल जोतना चाहते हैं या AC ऑफिस में बैठकर काम करना."
AC ऑफिस में बैठकर वो किसान और उसके बेटे तो काम नहीं ही करेंगे .और अगर ये ऑप्शन हो तो भी अपना स्वामित्व और गुलामी का फर्क बहुत बड़ा है . ये तर्क भी दिया जा रहा है ," जमीन से अच्छी फसल नहीं हो रही, सुविधाएँ नहीं हैं, इसलिए वहां फैक्ट्री लगाई जाये तो उसमे क्या बुराई है ?...इसके बदले सुविधाएं उपलब्ध क्यों नहीं कराई जा रहीं कि बढ़िया फसल हो.
दो साल पहले मेरी कामवाली अपने गाँव वापस लौट गई .सात साल पहले वो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए मुम्बई आई थी .यहाँ घरों में काम करके बच्चों को पढ़ाया और जब वे नौकरी पर लग गए तो वो गाँव लौट गई .पिछले साल मिलने आई थी , अच्छी तंदरुस्त हो गई थी और थोड़ी काली भी .उसके पास काफी जमीन है, उसमें बढ़िया फसल हुई थी, कपास, सोयाबीन,चना.
अभी कुछ दिनों पहले फिर से मिलने आई थी. इस बार उसके खेत खाली पड़े हैं .पानी नहीं बरसा .फसल नहीं हो पाई .वो कुछ महीने फिर से घरों में काम करके गाँव लौट जायेगी क्योंकि उसके पास जमीन है और शायद इस साल अच्छी बारिश हो.
यही उसके खेतों को पानी की सुविधा मिली होती और उसके गाँव में अच्छे स्कूल होते तो शायद वो गांव छोड़कर शहर आती ही नहीं. अगर उसके पास जमीन होगी ही नहीं तो वो सारी ज़िन्दगी ये झाड़ू पोछा ही करती रहेगी .उसका पति हमेशा गाँव में ही रहा .उसे भी मजदूरी करनी पड़ेगी .रखा हुआ धन कितने दिन चलता है.
एक जमीन अधिग्रहण ऐसा भी
Sharad Shrivastav
दिल्ली मे कामन वेल्थ गेम के समय बहुत से नए फ्लाई ओवर बने थे.नेहरू प्लेस से एनएच 8 तक की रोड को सिग्नल फ्री करने के लिए उस पर बहुत से फ्लाई ओवर बनाए गए.लेकिन अंतिम फ्लाई ओवर राव तुला राम मार्ग का फ्लाई ओवर 6 लेन की जगह सिर्फ 2 लेन का बनाया गया.बाकी फ्लाई ओवर बनाने के लिए लोगों की दुकाने तोड़ी गयी, मकान हटाये गए.लेकिन ये सब कुछ राव तुला राम पर नहीं हो सका.आज उस 2 लेन फ्लाई ओवर की वजह से घंटो का जाम लगे रहने की आम मुसीबत है.लोग फँसते है, पेट्रोल जलाते हैं अपना कलेजा जलाते हैं, सरकार को इस 2 लेन फ्लाई ओवर की वजह से कोसते हैं और आगे बढ़ते हैं.
सवाल है की ये फ्लाई ओवर 2 लेन का ही क्यों बना, बाकी फ्लाई ओवर की तरह 6 लेन का क्यों नहीं.जवाब है इस फ्लाई ओवर के एक तरह बसे लोग, जो बहुत प्रभावशाली हैं.जिनमे चैनल पर बोलने वाले प्रसिद्ध न्यूज़ एंकर भी हैं.इन लोगों के घरों की जमीन ही एक बीघे से ऊपर है.दिल्ली के पॉश इलाके मे 1 बीघे जमीन का मतलब आप समझते ही होंगे की वहाँ बसे लोग कैसे होंगे.खैर सवाल उनकी जमीन का भी नहीं था.सरकार को फ्लाई ओवर बनाने के लिए उनकी जमीन नहीं चाहिए थी.उनके घर के बाहर की सर्विस लेन चाहिए थी, जो वैसे ही सरकारी थी.लेकिन प्रभाव तो अब ऐसा ही होता है.बाज लोगों ने वो भी नहीं लेने दी.
नतीजा आज सामने है.तो साहब जमीन अधिग्रहण का एक रूप ये भी है.सवाल सिर्फ कानून बनाने का नहीं कहाँ किस पर लागू करना है इस नीयत का भी है.जमीन सिर्फ किसान की ही नहीं ली जाती, शहरो मे भी जमीन ली जाती है.इस कानून की मार सब पर है, लेकिन एक बराबर नहीं. यूपी के एक छोटे शहर मे रेलवे क्रासिंग पर फ्लाई ओवर इसलिए न बन सका क्योंकि मंत्री महोदय अपने घर की बाउंडरी गिराने को तैयार न हुए, थोड़ी सी जमीन छोड़ने को तैयार न हुए.वो फ्लाई ओवर वहाँ से तीन किलोमीटर दूर बनाना पड़ा.

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

फरवरी इतनी गरम हो गयी है या सरकार की आंखों का पानी सूख गया है


पिछले दो दिन से फेसबुक पर किसान और उसकी जमीन पर उसके हक की बातें की जा रही हैं. यह अच्छा अवसर है वरना फेसबुक पर किसान और जमीन की बातें कहां होती थीं. अभी भी माहौल बदलने लगा है. कोई मदर टेरेसा विवाद की ओर बहक रहा है, कोई लप्रेक में उलझा है तो कोई क्रिस गेल की जै-जैकार कर रहा है. इस बीच कुछ लोगों ने बड़ी रोचक टिप्पणियां की हैं. ये टिप्पणियां आपके लिए छांट कर लाया हूं. मौका निकाल कर पढ़ें, इस अबूझ मसले को समझने में थोड़ी मदद मिलेगी....
Rajneesh Dhakray
उनके पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें हैं और कई तो नंगे पैर भी हैं. पैरों में बिवाईयों की नालियाँ बनी हुई हैं ऐसे में सीधे से खड़ा न हुआ जाये और वे सैकड़ों किलोमीटर चल रहे हैं रोज 12-14 किलोमीटर. एक वक़्त का खाना और रात गुजारने के लिए सिर के ऊपर खुला आसमान तो नीचे कंकरीली काली सड़क. फरबरी इतनी भी गरम नहीं होती कि रात को सिर्फ पतले कम्बल या चादर से ठण्ड बचाई जा सके. वे हज़ारों की संख्या में पंक्तिबद्ध होकर चल रहे हैं. दिल्ली उनसे उनकी जीविका छीनने की तैयारी में है और वे सत्याग्रह कर रहे हैं. स्वतंत्र (?) भारत में खुद के चुने हुए प्रतिनिधियों से गिड़गिड़ा रहे हैं कि उनकी ज़मीनें उनसे न छीनी जाएं, उनके जंगल जो हज़ारों सालों से उनका घर है उससे उनको बेदखल न किया जाए.
क्या एक नागरिक को उसके देश में एक टुकड़ा ज़मींन का हक़ नहीं होना चाहिए, जिस मिट्टी हवा पानी से उसका शरीर बना हुआ है क्या वही उसे उस देश का नागरिक बना देता है. इस सत्याग्रहियों की टोली में आदमी, औरत बच्चे सब हैं हर उम्र के हैं. बूढी अम्मा, अधेड़ चाची, युवा भाभी और युवतियाँ, बच्चियाँ. क्यों चल पड़े हैं ये लोग अपने घरों से, ये न पढ़े लिखे हैं और न ही इन्हें कानून की समझ है ये सरकार की विकास नीति भी नहीं समझते फिर क्यों ऐसे असह्यः कष्ट झेलते हुये दिन रात एक किये हुए हैं. वजह है इसके पीछे और इस वजह की समझ किसी किताब को पढ़कर या सेमिनार अटेंड करके नहीं आई है, उन्होंने ज़िन्दगी की किताब पढ़ी है, जीने की ज़द्दोज़हद का सेमिनार अटेंड किया है. एक रोटी, एक गमछा, एक पैरासिटामोल को तरसती ज़िन्दगियों को ख़त्म होते देखा है और यही उनकी पाठशाला है.
एक किसान अपनी जमीन से सिर्फ अपना पेट नहीं भरता बल्कि दस अन्य भूमिहीनों की जीविका भी उसी ज़मीन पर निर्भर होती है. अधिग्रहीत भूमि पर भूस्वामी को उचित मुआवजा (?)- जिसमें भूमि के मूल्य का दोगुना या तीनगुना मूल्य और एक परिजन को नौकरी देना शामिल हो सकता है- देकर क्या उस भूमि के वास्तविक मूल्य की भरपाई हो सकती है? फिर उन भूमिहीनों का क्या होगा जो परोक्ष रूप से उस जमींन से रोजगार पाते हैं और अपना एवं अपने परिवार का पेट भरते हैं, उन्हें क्या मुआवज़ा मिला कौन सी नौकरी मिली? जितने उद्योग लगते हैं इनमें किन्हें नौकरी मिलती है और किसका विकास होता है, इन प्लांट्स में काम करने वाला एक अदना सा चपरासी उन लोगों से जो कभी उस भूखंड के मालिक हुआ करते थे, कैसा हिकारत भरा व्यवहार करते हैं!
एक इंसान को 10-15-20 हज़ार की नौकरी के एवज़ में 10 लोगों की 5-5 हज़ार रूपये की आमदनी नहीं छीनी जा रही. ये कैसा विकास है? और एक इंसान को रोजगार देकर बाकी के 9 लोगों को भुखमरी की हालत में नहीं छोड़ा जा रहा? क्या फरबरी इतनी गरम हो गई जो इन पूंजीपतियों की सरकारों की आँख का पानी ही सूख गया? नहीं जनाब फरबरी इतनी भी गरम नहीं है बस एक रात खुले आसमान के नीचे बिताइये.
Rakesh Kumar Singh
अपने डेढवर्षीय संक्षिप्‍त कॉर्पोरेट कम्‍युनिकेशन काल में भूमिअधिग्रहण में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार का साक्षात भागीदार रहा हूं. दो थर्मल पावर प्रोजेक्‍ट्स के लिए लैंड एक्वायर होते देखा है. जनता की आवाज़ दबाने और उसके विरोध को समर्थन में तब्‍दील करने के जालिमाना नुस्‍खों के बारे में सुनेंगे तो होश फाक्‍ता हो जाएंगे आपके. पर्यावरणा के लिए होने वाली जनसुनवाई को 'सफल' बना लेने के बाद, कंपनी के कारिंदे बैठकर समर्थन का पोस्‍टकार्ड लिखते हैं, जो कलेक्‍टर की रिपोर्ट के साथ नत्‍थी होकर राजधानी में श्रमश्रक्ति भवन स्थित पर्यावरण मंत्रालय आते हैं. मंजूरी सुनिश्चित कराने. रात के जिस पहर में ये तैयारियां चल रही होती हैं, प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सचिव के कमरे में हड्डी, बोतल, गड्डी समेत सारा इंतजाम टंच रहता है. एक कलेक्‍टर साहब को देखा, वे तबादले का फरमान हाथ में थाम लेने के बाद भी पर्यावरण जनसुनवाई की फाइल पर अपना दस्‍तखत दाग कर ही नयी पदास्‍थापना की ओर बढे.
ज़मीन ग़रीब किसानों की थी. आदिवासियों की भी थी. मुट्ठी भर अमीरों की भी थी. दलाल अमीरों में से चुने-बनाए गए थे. जिन्‍होंने, किसानों को जो जिस भाषा में समझे उस भाषा में समझाकर ज्‍यादातर ज़मीन कंपनी के हक में करवाए. जो रह गए उसको प्रशासन के साथ मिलकर कंपनी ने संभाला. जो न संभले उन्‍हें टेक्‍ल करने में पुलिस भी शामिल हो गई. उसके बाद भी जो बचे रह गए, वे रह गए. लड़ रहे हैं हक और आत्‍मसम्‍मान की लड़ाई. जिंदगी दूभर कर दी है संत्‍ता और कॉर्पोरेट ने मिलकर उनकी. अमूमन हर आने वाले घटनाक्रम की जानकारी शासन को होती है.
Arun Chandra Roy
दिल्ली के चारो ओर ध्यान से देखिये. किसान ख़त्म हो गए हैं. वे बिल्डर बन गए हैं. वे बिल्डिंग मेटेरियल के सप्लायर बन गए हैं. माल में बड़े शो रूम चला रहे हैं. उनके बच्चे एसयूवी में घूम रहे हैं. एनसीआर के तमाम डिस्को और पब उन्ही से गुलज़ार हैं. मुआवज़े का पैसा इसी पीढी में ख़त्म होने वाला है. हजारो हज़ार हेक्टेयर पर जहाँ गेहूं सरसों लहराते थे वहां पीलर उठ गए हैं. यह विकास है. और यह तमाम मेट्रो से लेकर बिहार झारखण्ड छतीसगढ़ ओडिशा में किसानो आदिवासियों से स्वावलंबन छीन रहा है. और रही सही कसर बीज खाद के दाम और सिंचाई की कमी कर रही है.
ये भी समझाया जा रहा है कि किसानी एक निकृष्ट पेश है. सीमान्त किसान की लगत पूरी नहीं हो रही है. ताकि कार्पोरेट फार्मिंग के लिए जमीन तैयार हो सके. दो दशको से बेरोकटोक ऐसा हो रहा है. सभी सरकारे शामिल रही हैं इसमें. उद्देश्य है कृषि पर निर्भरता और स्वावलंबन को ख़त्म करना. ये केवल धरने से यह नहीं होगा. बड़े आन्दोलन की जरुरत है इसके लिए. यह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से कही अधिक गंभीर समस्या है.
Anupam
कल सुबह मैं आ रहा हूँ. आपके घर. साथ में चार पुलिस वाले को भी लाऊंगा. आपका घर और ज़मीन मुझे चाहिए. चिंता मत करिए, मुफ्त में नहीं लूँगा. उसका मुआवाजा भी दूंगा लेकिन अपनी शर्त पर. आप मुझे नहीं बता सकते कि आपके घर की क्या कीमत है. आपके घर की कीमत तो मैंने खुद तय कर रखी है. मुझे दरअसल एक स्कूल बनाना है, देश के लिए. देश के विकास के लिए. मैं उस स्कूल से पैसे भी नहीं बनाऊंगा. सिर्फ समाज-सेवा करूँगा. बस आपका घर दो दिनों में खाली हो जाना चाहिए. मुआवजा मैं आपको एक हफ्ते में दे दूंगा. और बाद में अगर आपको स्कूल न दिखे तो वापिस घर मांगने मत आ जाना. हो सकता है मैं स्कूल न भी बना पाऊं, इसमें मेरी क्या गलती. और तो और, आप मेरे खिलाफ किसी अदालत में भी नहीं जा सकते.
जी हाँ, ठीक समझा आपने. मैं भूमि-अधिग्रहण वाले मुद्दे की तरफ ही संकेत कर रहा था. कुछ लोग हैं जो "विकास" और "प्रगति" के नाम पर लाये गए मोदी जी के इस अध्यादेश का समर्थन करते हैं. इतना ही नहीं, वो लोग मेरे जैसे लोगों को तो विकास-विरोधी भी मानते हैं. उन सभी दोस्तों से मेरा सवाल है कि कल सुबह कहीं मैं आपका ही घर कब्ज़ा करने आ गया तो? ..क्या करेंगे आप, क्या जवाब देंगे? सोच समझ के जवाब दीजियेगा.. कहीं आप भी विकास-विरोधी ना बन जाएँ.

रविवार, 8 फ़रवरी 2015

उड़िया गया यूरिया, मच रही है लूट


बासुमित्र
यूरिया की कालाबाजारी एवं किल्लत को लेकर बुधवार को मधेपुरा में किसानों का आक्रोश फूट पड़ा. मधेपुरा के मुरलीगंज में स्थिति इतनी भयावह हो गयी कि किसान ट्रक पर लदी खाद बोरियां लूट ले गये. उपद्रव कर रहे किसानों को नियंत्रित करने के लिए एसपी आशीष भारती को खुद मोरचा लेना पड़ा, तब जाकर शाम चार बजे तक हालत काबू में आये. कई महीनों से किसान यूरिया की किल्लत से परेशान थे. बुधवार की अहले सुबह किसानों को सूचना मिली कि दो ट्रक खाद एक एजेंसी के गोदाम पर पहुंचनेवाला है. सुबह तीन बजे ही हजारों की संख्या में किसान एजेंसी की दुकान व गोदाम के पास पहुंच गये. वहां किसानों को पता चला कि ट्रक बेंगा नदी के किनारे लगा हुआ है. इसके बाद किसान कई भाग में बंट कर प्रदर्शन व नारेबाजी शुरू कर दी. एक गुट नदी के किनारे लगे ट्रक के पास पहुंच कर खाद की बोरियां लेकर भागने लगे. सूचना पर थानाध्यक्ष, बीडीओ व सीओ मौके पर पहुंचे और किसानों से पंक्तिबद्ध होकर खाद लेने के लिए समझाया. किसान मान गये. इसके बाद अधिकारियों ने किसानों को बीएल हाइस्कूल के मैदान पर खाद वितरण होने की बात कही. जब किसान बीएल हाइस्कूल पहुंचे, तो वहां खाद का ट्रक नहीं देख आक्रोशित होकर थाने पर हमला बोल दिया.
पंद्रह दिन पहले ही पटवन हो चुका है. खेत में गेहूं मक्का के फसल लहलहा नहीं रहे हैं. किसान यूरिया के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं. लेकिन यूरिया बाजार से गायब है. चौक-चौराहे से लेकर गली मोहल्ला के खाद-बीज की दुकानों पर यूरिया की खोज कर निराश लौट जाते हैं. हर साल खेती के समय यही आलम होता है. जमाखोरी और कालाबाजारी के कारन यूरिया बाजार से गायब हो जाती है और किसान लाचार और बेबस हो जाते है. 335 से 350 रुपये प्रति पैकेट बिकने वाला यूरिया 500 से 550 रुपये की दर से चोरी छिपे बिक रहा है. अपनी खेती और फसल बचाने के चक्कर में किसानों की जेब ढीली हो रही है.
पेशे से मास्टर धमदाहा के चन्द्रशेखर मरांडी ब्लैक में 500 रुपये प्रति बोरा की दर से यूरिया खरीद कर भी खुश हैं. चलो पैसा जो ज्यादा लगा कम से कम फसल तो बच गयी वरना यूरिया के बिना फसल तो मार ही खा जाती.
खोजे ही नहीं मिल रहा यूरिया
सब किसान चंद्रशेखर की तरह खुशनसीब नहीं है. वैसे किसान जिसकी जीविका का प्रमुख्य साधन खेती-किसानी ही है, उसकी स्थिति और ज्यादा खराब है. वे लगातार 15 दिनों से दुकान का चक्कर लगा रहे हैं. गेहूं की खेती कर रहे रामचंद्र युवा किसान है. रामचंद्र बताते हैं की इस साल 5 बीघा में गेहूं बोया था, पटवन हो चुका है. यूरिया के लिए रोज 10 किलोमीटर का सफर तय कर बाजार तक आते हैं. दुकान-दुकान पूछ -पूछ कर थक चुके हैं लेकिन कही जुगार नहीं बैठ रहा है. खेती-किसानी के समय यूरिया की किल्लत होगी तो कैसे खेती होगी. यूरिया के बिना अनाज ही नहीं होगा सब चौपट हुआ जा रहा है.
महीने भर से चल रहा है लुकाछिपी का खेल
ऐसा नहीं है की यूरिया की किल्लत अचानक से सामने आयी है. एक माह से कीमत और स्टॉक का खेल चल रहा है. आम दिनों में 350 रुपये में बिकने वाला यूरिया 450 रुपये में चोर बाजार में बिकना शुरू हो गया था. लोग जरूरत और मजबूरी के नाम पर ऊंची कीमत पर खरीद भी रहे थे. जैसे-जैसे बोने का सीजन ख़त्म हुआ यूरिया का दाम भी सर चढ़ने लगा.

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

79 दिन से खरीद के इंतजार में पड़ा है धान


यह एक किसान का दर्द है. यह किसान पहले पत्रकार था और दिल्ली में अच्छी खासी नौकरी कर रहा था. मगर उसने तय किया कि वह अपने गांव में जाकर खेती करेगा और दुनिया के इस प्राचीनतम पेशे से जुड़कर गौरवान्वित महसूस करेगा. चिन्मयानंद सिंह काफी संवेदनशील युवा हैं और खेती के साथ-साथ फेसबुक पर भी काफी सक्रिय रहते हैं और गांव की मधुरता को हमारे लिए पेश करते हैं. आज उनकी वाल पर एक उदास करने वाली पोस्ट थी, जिसे पगडंडी आपके सामने साझा कर रहा है. इस विडंबना को समझने के लिए कल की पोस्ट किसानों को देश निकाला दे दीजिये हुजूर... को भी पढ़ा जाये.
आज #खलिहानडायरी में दर्द बयां कर रहा हूं। इस तरह बिखरे हुए धान के लिए बिहार सरकार जिम्मेदार है। पिछले 79 दिनों से यह धान पैक्स द्वारा अपनी खरीद का इंतज़ार कर रहा है, और रोज़ ही तारीख बढ़ती जाती है। इधर चूहों और गिलहरियों का खेल जारी है। आज मन चिढ़ा हुआ है अब,पिताजी ने भी अल्टीमेटम दे दिया है कि अपनी जिद छोड़ो और बाज़ार में बेच लो। मेरी जिद पर ही धान को रोककर रखा गया था, नहीं तो कब का ही इसे 1600₹ की जगह 950₹/क्विंटल की दर से बेच दिया जाता। अब लगता है कि इसके कपार में ही नहीं लिखा हुआ है अच्छा दाम पाकर बिकना। आखिर किसान का घर फसल बेच कर ही चलता है ना, कितने दिन तक इंतज़ार करेगा किसान भला? और दो-चार दिन में नहीं होगी अगर धान की अधिप्राप्ति....तो फिर बेच देंगे ऐसे ही। #खलिहानडायरी

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

किसानों को देश निकाला दे दीजिये हुजूर...


कहने को बिहार सरकार ने किसानों की धान की देश में सबसे ऊंची कीमत 1560 रुपये प्रति क्विंटल देने की घोषणा कर दी है, मगर हकीकत है कि राज्य के अधिकतर इलाकों में घोषणा के दो माह बीत जाने पर ही धान खरीद केंद्र अब तक नहीं खुले हैं. जहां खुले भी हैं वहां सौ अड़गे और बहानेबाजी, लिहाजा किसान इस बार खरीफ की पैदावार लेकर बिचौलियों की शरण में जाने को विवश हैं. वहां उन्हें 1100 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक मिलने की कोई सूरत ही नहीं बन रही है. यह स्थित तकरीबन बिहार के हर इलाके की है. यहां बासुमित्र ने पूर्णिया जिले के धमदाहा अनुमंडल के किसानों के जमीनी हालात को बताते हुए यह समझने-समझाने की कोशिश की है कि आखिर जमीन पर घट क्या रहा है... दिल्ली में सत्ता के उखाड़-पछाड़ और ओबामा के आने की रौनक के बीच इस खबर को भी पढ़े जाने की जरूरत है. क्योंकि सोशल मीडिया के इस दौर में भी इस बात का इंतजाम अब तक नहीं हो पाया है कि इंसान बिना कुछ खाये जिंदा रह सके....
(तसवीर के लिए प्रशांत चंद्रन का आभार)
पिछले साल के नवंबर महीने में धमदाहा के किसानों की बोली में जो ठसक थी वह इन दिनों गायब है. उनके मुंह से बकार नहीं फूट रहा. घर धान से भरे हैं, मगर बुद्धि काम नहीं कर रहा है कि बेचें कि बचा लें. पैकार(व्यापारी) का भाव ग्यारह से उपर नहीं जा रहा. पिछले दो माह से लोग रोज पैक्स जाकर देखते हैं कि सरकारी खरीद केंद्र खुला कि नहीं. अखबारों में 1560 रुपये के भाव के दावे भी पुरानी फिल्म के पोस्टर की तरह उतर गये हैं. कहीं कोई धान खरीद की बात नहीं कर रहा. न पक्ष, न विपक्ष. रोज दरवाजे पर धान को फैला देते हैं कि नमी की कमी बरकरार रहे, कहीं फफूंद न लग जाये... और पता लगाते रहते हैं कि कहीं कोई पैकार ज्यादा भाव तो नहीं दे रहा.
पूर्णिया जिले का कृषि विभाग बताता है कि इस बार जिले में लक्ष्य से अधिक धान की खेती की गयी है. जिला कृषि पदाधिकारी इन्द्रजीत प्रसाद सिंह कहते हैं, विभाग से तो सिर्फ 98 हजार हेक्टेयर जमीन पर धान की खेती का लक्ष्य आया था, जबकि किसानों ने 1 लाख 2 हजार हेक्टेयर में धान रोप दिया. हालांकि इससे किसानों को कोई नुकसान नहीं हुआ. किसान इंद्र भगवान को दोष नहीं देते हैं, कहते हैं, भले शुरुआत पानी कम पड़ा मगर जाते-जाते कसर पूरी कर दिया. ऐसे उपज भी जोरदार हुई. धान की बाली को देखकर किसान मूंछ पर ताव दे रहे थे कि इस बार तो मकई के नुकसान का कसर भी निकल जायेगा. पिछले सीजन में मक्के की फसल गड़बड़ा गयी थी.
गांव के किसान नवीनचंद्र ठाकुर कहते हैं, किसानों के साथ यही होता है. कभी उपरवाले की मार तो कभी सरकार की बेवफाई... जब मौसम खराब होता है तो हमलोग मन मसोस कर रह जाते हैं. मगर जब बंपर पैदावार हो और फसल का पैसा ठीक से नहीं मिले तो समझ नहीं आता, क्या करें. उड़ती-उड़ती खबर है कि सरकार इस बार धान खरीदना ही नहीं चाहती. एक तो सरकारी गोदाम पहले से फुल है, फिर सुन रहे हैं खाद्य सुरक्षा के कानून में भी कटौती होने वाली है. इसलिए मीडिया में सरकारी खरीद का ढोल जरूर पीटा जा रहा है, मगर सरजमीन पर ऐसा इंतजाम किया गया है कि क्या कहें... देख ही रहे हैं, फरवरी में भी क्रय केंद्र नहीं खुला है...
नवीन जी तो थोड़े समृद्ध किसान हैं. वे थोड़ा नफा-नुकसान झेल लेते हैं. मगर लीज पर खेत लेकर खेती करने वाले छोटे किसान तो धान की बात पूछने पर ही बमक उठते हैं. नागिया देवी कहती हैं, पहले जहां 3 से 4 हजार रुपये में एक बीघा जमीन लीज पर मिल जाता था, अब लीज का रेट भी दो गुना से अधिक बढ़ गया है. उसने बेटी की शादी के लिए सूद पर पैसा लिया था. सोचा था, धान बेचकर कर्ज चुका देगी. अब तो महाजन के सामने जाने में डर लगता है.
बटाई पर खेती करने वाले मनोहर बताते हैं, हमने पंप सेट चलाकर पटवन किया था. डीजल अनुदान का पैसा भी टाइम पर नहीं मिला. पता चला कि पैक्स में इस बार धान का रेट 1560 रुपया हो गया है, हम उसी उम्मीद में थे. अब आधा धान 1050 रुपया के रेट से बेचे हैं, बांकी बचा कर रखे हैं कि कहीं रेट बढ़ जाये या खरीद केंद्र ही खुल जाये...
लीज पर खेती करने वाले ब्रह्म मुनि बताते हैं, चाहे धान की खेती हो मक्के की किसानी गरीबों के बस से बाहर होती जा रही है. खेत जुताई से लेकर खाद-बीज और मजदूरी तक बढ़ती जा रही है जिस कारण से खेती की लागत पहले की तुलना में काफी बढ़ गयी है. धान की खेती का हिसाब पूछने पर वे कहते हैं, अगर लीज ले कर खेती की जाय तो एक बीघा धान की खेती में 12 से 13 हजार रुपये का खर्च आ जाता है. वहीं एक बीघा में 16 से 20 क्विंटल धान उपजता है. किसान परिवार लगातार 4 महीने की मेहनत के बाद मुश्किल से 6 से 7 हजार रुपये बचा पाता है वो भी तब फसल अच्छी हो और धान का सही कीमत मिले. मगर इस बार तो उस पर भी आफत है... सरकार तो 1560 रुपया का रेट ब्रोडकास्ट(ब्रॉडकॉस्ट) करके ताली पिटवा रही है, यहां एक कोई एक कनमा धान खरीदने के लिए तैयार नहीं है. इससे अच्छा तो किसानों को देश निकाला दे दीजिये हुजूर...

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

एक तरफ फुकोशिमा तो एक तरफ चुटका


एटॉमिक एनर्जी के जरिये देश को जगमग कर देने का सपना हर शहरी भारतीय को लुभाता है. मगर अगर उनके पड़ोस में एटॉमिक पावर प्लांट खुलने की योजना बन जाये तो क्या वे चैन से रह पायेंगे? खास तौर पर अगर उन्हें फुकोशिमा और चेरनोबिल एटॉमिक प्लांट के हादसों की जानकारी हो? कुछ ऐसा ही पिछले दिनों मध्यप्रदेश के चुटका गांव के लोगों के साथ हुआ. सरकार ने वहां एटॉमिक पावर प्लांट खोलने का फैसला ले लिया था. मगर गांव वालों के मजबूत प्रतिरोध की वजह से प्लांट का मसला खटाई में पड़ गया. चुटका का प्रकरण हमें एटॉमिक पावर प्लांट के असली खतरे की ओर इशारा करता है और साथ ही यह भी बताता है कि भारतीय गांव अब इतने नासमझ नहीं रहे कि इन्हें कोई भी बहलाकर ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा कर दे. यह प्रकरण भारत में परमाणु ऊर्जा के भविष्य की झलक देता है. चुटका गांव के इस अनूठे संघर्ष की कहानी मित्र प्रशांत दुबे ने लिखी है. वह हम यहां पेश कर रहे हैं. इस आलेख के लिए हम तरकश ब्लॉग के आभारी हैं.
प्रशांत कुमार दुबे
चुटका परमाणु विद्युत परियोजना को लेकर सरकारी महकमे, सम्बंधित कंपनी, उसके कर्मचारी और कथित रूप से पढ़ा-लिखा एक वर्ग जानना चाहता है कि सिरफिरे आदिवासी आखिर विकास क्यों नहीं चाहते? रोजगार और विकास की आने वाली बाढ़ की अनदेखी कर ये अपने अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी क्यों मारना चाहते हैं? भारत सरकार और जनप्रतिनिधियों के प्रति अहसानमंद होने के बजाए ये लोग उल्टा सरकार को क्यों कटघरे में खड़ा कर रहे हैं?
मध्यप्रदेश के मंडला जिले में दो चरणों में 1400 मेगावाट परमाणु बिजली पैदा करने वाली इस परियोजना की योजना सन् 1984 में बनी थी. इसकी आरंभिक लागत 14 हजार करोड़ रुपए तथा इस हेतु 2500 हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी. अक्टूबर 2009 से केन्द्र सरकार ने इस परियोजना को आगे बढ़ने की अनुमति दे दी है. सरकार इसे 2800 मेगावाट तक विस्तारित करना चाहती है और जिसके चलते 40 गांवों को खाली कराना होगा. इस परियोजना के निर्माण का ठेका परमाणु विद्युत कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (आगे हम इसे कम्पनी कहेंगे) को दिया गया है. सरकार का कहना है इससे स्थानीय लोगों व आदिवासियों को रोजगार मिलेगा. यह एक सस्ती और बढि़या पद्धति है. इतना ही नहीं विस्थापित होने वाले प्रत्येक परिवार को भारत का परमाणु बिजली निगम मुआवजा देगा.
यह बातें तो अनजान शहरी वर्ग को और इस परियोजना के पक्ष में खड़े लोगों को आकर्षित करती हैं. वैसे ठेठ निरक्षर आदिवासी लोग इसके पीछे छिपे उस अप्रत्यक्ष कुचक्र की बात कर रहे हैं। जिसके विषय में ना ही कोई सरकारी व्यक्ति और ना ही कोई सरकारी रिपोर्ट बात कर रही है. आदिवासियों का मानना है कि जब हमारे पास ऊर्जा के दूसरे, सस्ते और नुकसान रहित विकल्प मौजूद हैं तो फिर सरकार आंख मूंदकर परमाणु उर्जा के पीछे क्यों भाग रही है.
आदिवासी जान गए हैं कि परमाणु बिजलीघर से पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक विकिरणीय कचरा पैदा होता है. यूरेनियम से परमाणु ऊर्जा निकलने के बाद जो अवशेष बचता है वह 2.4 लाख साल तक तीव्र रेडियोधर्मिता युक्त बना रहता है. दुनिया में इस कचरे के सुरक्षित निष्पादन की आज तक कोई भी कारगर तकनीक विकसित नहीं हो पाई है. यदि इसे धरती के भीतर गाड़ा जाता है जो यह भू-जल को प्रदूषित और विकिरणयुक्त बना देता है. उनका सवाल है, रूस के चेर्नोबिल और जापान में फुकोशिमा जैसे गंभीर हादसों के बाद तथा अमेरिका जैसे परमाणु उर्जा के सबसे बड़े हिमायती देश द्वारा भविष्य में कोई भी नया परमाणु विद्युत संयत्र लगाने का फैसला तथा पिछले पिछले चार दशकों में अब तक 110 से ज्यादा परमाणु बिजली घर बंद करने के बाद भी हमारी सरकार परमाणु ऊर्जा के प्रति इतनी लालायित क्यों है?
परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के शुरू होने से भारत में अब तक 300 से भी ज्यादा दुघर्टनाएं हो चुकी हैं. लेकिन सरकार ने कभी इनके पूरे प्रभावों के बारे में देश की जनता को कुछ नहीं बताया. हमारे यहां झारखंड की जादुगुड़ा खान से यूरेनियम निकाला जाता है. वहां भी विकिरण के चलते लोगों के गंभीर रूप से बीमार होने और मरने तक की रिपोर्ट हैं. चुटका परमाणु संघर्ष समिति के लोग रावतभाटा और अन्य संयत्रों का अध्ययन करने के बाद जान पाए कि इन संयत्रों के आसपास कैसे जनजीवन प्रभावित हुआ है. संपूर्ण क्रांति विद्यालय बेडछी, सूरत की रिपोर्ट तो और आंख खोल देती है. रिपोर्ट के मुताबिक परमाणु संयंत्रों के आसपास के गांवों में जन्मजात विकलांगता बढ़ी है, प्रजनन क्षमता पर प्रभाव पड़ा है, निसंतानों की संख्या बड़ी है, मृत और विकलांग बच्चों का जन्म होना, गर्भपात और पहले दिन ही होने वाली नवजात की मौतें बढ़ी है. हड्डी का कैंसर, प्रतिरोधक क्षमता में कमी, लम्बी अवधि तक बुखार, असाध्य त्वचा रोग, आंखों के रोग, कमजोरी और पाचन तंत्र में गड़बड़ी आदि शिकायतों में वृद्धि हुई है.
परमाणु विरोधी राष्ट्रीय मोर्चा, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संयोजक, डॉ. सौम्या दत्ता बताते हैं कि कैसे इस परियोजना को लेकर भी सरकार और कम्पनी ने कदम-कदम पर झूठ बोला है या बहुत सारी बातों और चिंताओं को सार्वजनिक नहीं किया है. अव्वल तो यही कि कंपनी के निर्देशों के अनुसार परमाणु विद्युत परियोजनाओं को भूकंप संवेदी क्षेत्र में स्थापित नहीं किया जा सकता है. फिर भी राष्ट्रीय पर्यावरण अभियंत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) नागपुर द्वारा तैयार जिस रिपोर्ट पर जन-सुनवाई रखी गई थी, उस रिपोर्ट में भूकंप की दृष्टि से उक्त क्षेत्र के अतिसंवेदनशील होने के तथ्य को छुपाया गया है, जबकि मध्यप्रदेश सरकार की आपदा प्रबंधन संस्था, भोपाल द्वारा मंडला और जबलपुर को अतिसंवेदनशील भूकंपसंवेदी क्षेत्र घोषित किया है. उल्लेखनीय है कि 22 मई, 1997 को इसी क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर 6.4 तीव्रता का भूकम्प आ चुका है, जिससे सिवनी, जबलपुर और मण्डला में अनेक मकान ध्वस्त हुए और अनेक मौतें भी हुई थीं. दूसरा तथ्य जो सार्वजनिक नहीं किया गया है वह यह कि केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण (सी.ई.ए.) के अनुसार परमाणु बिजलीघर में 6 घनमीटर प्रति मेगावाट प्रति घंटा पानी लगता है. इसका अर्थ है कि चुटका परमाणु बिजलीघर से 1400 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए 7 करोड़ 25 लाख 76 हजार घनमीटर पानी प्रति वर्ष आवश्यक होगा. यह पानी नर्मदा पर बने बड़े बांधों में से एक बरगी बांध से लिया जाएगा! बरगी बांध के दस्तावेजों में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि इसका उपयोग केवल कृषि कार्यों और 105 मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए ही होगा, तो फिर यह पानी परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए कैसे जाएगा?
परमाणु संयंत्र से निकलने वाली भाप और संयंत्र को ठंड़ा करने के लिए काम में आने वाले पानी में रेडियोधर्मी विकिरण युक्त तत्व शामिल हो जाते है. भारत में अधिकांश परमाणु विद्युत परियोजनाएं समुद्र के किनारे स्थित हैं, जिनसे निकलने वाले विकिरण युक्त प्रदूषण का असर समुद्र में जाता है किन्तु चुटका परमाणु संयंत्र का रिसाव बरगी जलाशय में ही होगा. विकिरण युक्त इस जल का दुष्प्रभाव मध्यप्रदेश एवं गुजरात में नर्मदा नदी के किनारे बसे अनेक शहर और गांववासियों पर पड़ेगा, क्योंकि वहां की जलापूर्ति नर्मदा नदी से ही होती है. इससे जैव विविधता के नष्ट होने का खतरा भी है.
मध्यप्रदेश की आदर्श पुनर्वास नीति कहती है कि लोगों के बार-बार विस्थापन पर रोक लगनी चाहिए. चुटका से प्रभावित लोग एक बार बरगी बांध के कारण पहले ही विस्थापित हो चुके हैं, ऐसे में इन्हें यहां से पुनः विस्थापित करना नीति का ही उल्लंघन है. वैसे भी मंडला जिला पांचवीं अनुसूची में अधिसूचित क्षेत्र है. पंचायत (अनूसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम 1996 – (पेसा कानून) के अंतर्गत ग्रामसभा को विशेष अधिकार प्राप्त हैं. चुटका, कुंडा और टाटीघाट जैसे गांवों की ग्रामसभा ने पहले ही इस परियोजना का लिखित विरोध कर आपत्ति जताई है, तो फिर उसे नजरंदाज करना क्या संविधान प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है?
सबसे गंभीर बात यह है कि ग्रामीणों को अँधेरे में रखने हेतु परियोजना की 954 पृष्ठों वाली रिपोर्ट सिर्फ अंग्रेजी में प्रकाशित की है और यह भी तकनीकी शब्दावली से भरी पड़ी है. अभी रोजगार दिए जाने जैसे सवालों पर बात नहीं हुई है. जब तक इस परियोजना के लिए कार्यालय /कालोनी आदि बनेगी, तब तक स्थानीय जनों को मजदूरी वाला काम उपलब्ध कराया जाएगा. खुद कम्पनी के दस्तावेज कहते हैं कि यह एक तकनीकी काम है और जिसके लिए उच्च प्रशिक्षित लोगों की जरुरत होगी? इस विपरीत दौर में एक राहत की बात यह है कि चुटका में भारी जनदवाब के चलते परमाणु परियोजना के लिए पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट पर की जाने वाली जनसुनवाई को पुनः रद्द कर दिया गया है. जनसुनवाई की आगामी हलचल अब संभवतः विधानसभा चुनावों के बाद ही सुनाई दे.

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

क्यों तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में...


(धधकता मुजफ्फरपुर का अजीजपुर गांव, तसवीर-मुजफ्फरपुर लाइव के फेसबुक वाल से साभार)
पुष्यमित्र
मुजफ्फरपुर की खबर आपको मालूम है. कैसे लोगों ने पूरी बस्ती आग के हवाले कर दी. मसला यह नहीं है कि चार मरे या आठ. वे हजारों लोग क्या जिंदा थे, जिन्हें घरों को घूरा बना देने में एक पल को संकोच नहीं हुआ. कलेजा तो यह सुनकर कटता है कि यह सब मुहब्बत के नाम पर हुआ. किस शेर को याद करूं... एक आग का दरिया है... या तुम तरस नहीं खाते... जी चाहता है जिगर मुरादाबादी साहब की रूह को बुलावा भिजवा कर कहूं कि आपने जो शेर लिखा था, कभी सोचा था कि वह हकीकत में कैसा होगा... बशीर बद्र साहब तो देखते रहते होंगे. मुजफ्फरनगर और मुजफ्फरपुर में अब फर्क ही क्या रहा... नाम का भी तो नहीं...
भारतेंदु, उसकी बहन नीलम, सदाकत अली और उसकी बहन साथ-साथ पढ़ा करते थे. सातवीं कक्षा से ही इन चारों का साथ बरकरार था. दोस्ती ऐसी थी कि परिवार के नाते-रिश्ते बन गये थे. घरों में आना-जाना लगा रहता था. मगर महज चार साल में वक्त ने बिसात ही पलट कर रख दी. दसवीं की कक्षा में सिर्फ भारतेंदु ही पास हो पाया, बांकी तीनो असफल रहे. कहते हैं इस नतीजे ने पहले सदाकत के मन में खटास को जन्म दिया. फिर भारतेंदु और सदाकत की बहन एक दूसरे को पसंद करने लगे. पहले से मात खाये सदाकत के मन में संभवतः इस बात ने जहर बो दिया.
अब यह पुलिस अनुसंधान का मसला है कि भारतेंदु कैसे लापता हुआ और उसका कत्ल किसने किया. कहा जाता है कि सदाकत ने भारतेंदु को विदेश में नौकरी दिलाने का ऑफर दिया था, इसी वजह से भारतेंदु पटना से अपने गांव लौटा था. साल भर से भारतेंदु और सदाकत के बीच बातचीत बंद थी. नये साल के मौके पर दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई थी. भारतेंदु सहनी नौ जनवरी को अचानक लापता हो गया और 11 जनवरी को भारतेंदु के पिता कमल सहनी ने सदाकत को आरोपी बनाते हुए एफआइआर दर्ज करा दिया. फिर अचानक भारतेंदु का शव सदाकत के घर के पास बरामद हुआ और अजीजपुर बलिहारा गांव धधक उठा.
अब सवाल उठता है कि आखिर भारतेंदु का शव देखकर क्यों हजारों लोग बस्ती जलाने निकल पड़े. पहले तो तय होना चाहिये था कि आखिरकार हत्या किसने की. इस बात का कोई सबूत नहीं है कि हत्या सदाकत ने ही की होगी. अगर मान भी लिया जाये कि हत्या सदाकत ने की है तो क्या उसका दंड उसके परिवार-नातेदार, पड़ोसियों और कौम के लोगों को देना जायज है? हमारे मन में एक पुरानी ग्रंथी बैठी रहती है. हम एक व्यक्ति की गलती की सजा उसके परिवार, समाज, जात और कौम को देने पर उतारू हो जाते हैं. हम उसे इंडीविजुअल नहीं मानते. इसी ग्रंथी की वजह से लोग रेपिस्ट की मां-बहन से रेप करना जायज मान बैठते हैं. बेटे की सजा पिता को देते हैं.
मेरा दावा है कि देश के 99 फीसदी लोग इस ग्रंथी से मुक्त नहीं हैं. अगर मुक्त होते तो इस देश में मां-बहन के नाम से गालियां नहीं प्रचलित होतीं. आखिर इन गालियों का मकसद किसी व्यक्ति के अपराध की सजा उसकी मां और बहन को देना ही तो होता है. सारे दंगे इसी वजह से होते हैं. जमाना व्यक्तिवाद से भी आगे निकल जाने की हड़बड़ी में है, मगर हम कौम और समाज की इकाई से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं. अगर यह सच है कि सदाकत ने ही भारतेंदु की हत्या की या करवाई है, तो भी यह मामला भारतेंदु की मोहब्बत और सदाकत की नफरत का है. इसके आगे यह एक पुलिस केस है. मगर नहीं, लोग सदाकत की नफरत का सिला उसके पूरे कौम को देना चाहते हैं. समाज अचानक एक्टिव हो जाता है और फैसले लेने लगता है.
(अजीजपुर गांव में अगलगी के बाद अपने किराना गुमटी के सामने बचे सामान को बटोरती नसीमा बानो. तसवीर-प्रशांत रवि)
सवाल यह भी है कि हमारा समाज ऐसे ही वक्त में क्यों एक्टिव होता है? कहीं इसके पीछे कोई पॉलिटिकल लोचा तो नहीं. कहीं एंटी लव जिहाद टाइप एंगल तो नहीं निकाला जा रहा है? बहुत मुमकिन है ऐसा हो... और ऐसा नहीं होना भी उतना ही मुमकिन है. यह उसी तरह है जैसे यह मुमकिन है कि सदाकत ने ही भारतेंदु का कत्ल किया होगा और यह नहीं होना भी उतना ही मुमकिन है. इसलिए जैसे कुछ लोग सदाकत के हत्यारे होने के नतीजे पर फट से पहुंच जाते हैं, वैसे ही कुछ लोग इसमें पॉलिटिकल फ्लेवर की बात भी फट से सूंघ लेते हैं. मेरे हिसाब से दोनों अनुमान आपराधिक हैं. इससे नफरत बढ़ता है और आम लोगों की जान गंड़ासे की नोक पर पहुंच जाती है.
यह ठीक है कि हमारे गांव में जो समाज नाम की अनौपचारिक संस्था बची खुची बरकरार है, उसमें कुछ भी पॉजिटिव करने का धैर्य और हौसला नहीं बचा है. मगर उसकी भावना बहुत जल्द आहत हो जाती है, छोटी सी बात को लेकर उसे लगने लगता है कि कौम या बिरादरी के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है. इसलिए नेता नगरी कभी चार तो कभी दस बच्चे पैदा करने का फालतू फार्मूला उसे सुझाने लगती है. यही वजह है कि अपनी बेटी का दूसरी बिरादरी में चली जाना उसके लिए आन का मसला बन जाता है और दूसरे बिरादरी की बेटी लाना फख्र की बात. अब यहां उस घिसी पिटी बात को याद दिलाने का कोई तुक नहीं है कि यह समाज अपनी ही बेटियों को जन्म से लेकर उसके हर संस्कार के मौके पर कितना ह्यूमिलियेट करता है. हां उससे हम एक्सपेक्ट तो कर ही सकते हैं कि वह चार बच्चे पैदा करे, पति की चिता पर सती हो जाये और मलेच्छों के हाथ में पड़ने से पहले जौहर कर ले.
हम क्यों पांच सौ साल पुरानी सोच को छोड़ देने के लिए तैयार नहीं हैं. जबकि हम एक मोबाइल हैंडसेट को दो साल से अधिक यूज करने के लिए रेडी नहीं हैं. हम दीवार फिल्म के जमाने का बेलबॉटम आज पहन नहीं सकते मगर राजपूताना की उस ईगो वाली थ्योरी को आज भी बड़े गर्व के साथ ओढ़े हुए हैं. बदलिये भाई. बदलने के बिना आप सड़े जा रहे हैं.
भारतेंदु की मोहब्बत और सदाकत की नफरत को उसका निजी मामला बने रहने दीजिये. अगर सचमुच सदाकत की बहन के दिल में भारतेंदु के लिए मोहब्बत होगी तो सोचिये उस बच्ची पर क्या गुजर रही होगी. क्या आपके पास उसके दिल के जख्मों के लिए कोई दवा है... सदाकत की नफरत का इलाज पुलिस प्रशासन को करना है. न्याय की दरकार कमल साहनी के परिवार को है, दो हजार की भीड़ को नहीं. अब उनके चार या आठ लोगों को कैसे न्याय मिलेगा जिसका फैसला आपने अपने जुनून में कर दिया. उन्हें मछलियों की तरह जिंदा भून दिया. उनके परिजनों के आंसू कौन पोछेगा. जिस तरह भारतेंदु बेगुनाह था, उसी तरह वे लोग भी तो बेगुनाह ही होंगे... और क्या लिखूं...

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

बिहार का चीनी उद्योग - मीठी यादें, कड़वी सच्चाई


सुनील कुमार झा की पहचान शोधपरक खबरों के पत्रकार के रूप में है. वे खबरों के लिए पर्याप्त समय लेते हैं और अपनी खबर को मुकम्मल तरीके से पेश करते हैं. इन दिनों वे बिहार के जूट उद्योग के पतन की कहानी के तथ्य जुटाने में लगे हैं. हमने पगडंडी के लिए उनकी इस खबर पर पहले से दावा पेश कर दिया है. :) इससे पहले हम उनकी एक और बड़ी खबर पेश कर रहे हैं. यह खबर बिहार के चीनी उद्योग के पतन के बारे में है. चीनी उद्योग हो या जूट उद्योग दोनों का नाता गांव औऱ खेती किसानी से है. इन दोनों उद्योगों के पतन का असर यहां की किसानी और किसानों की आर्थिक हालत पर पड़ता है. इसलिए गांव और किसानी से जुड़े लोगों को यह समझना जरूरी है कि किस तरह उद्योगों का बना बनाया ढांचा भरभरा कर गिर जाता है. और एक झटके में लाखों लोग अर्श से फर्श पर आ जाते हैं. यह रपट काफी पहले लिखी गयी है, हो सकता है कई लोगों ने इसे पहले पढ़ा होगा इ-समाद में. मगर वह रिपोर्ट मैथिली में थी. अब यह रपट हिंदी में आपके सामने है. इस रपट के लिए हम सुनील कुमार झा के साथ-साथ नीलू कुमारी और इ-समाद के भी आभारी हैं. रपट पेश है...
एक समय था जब देश के चीनी उत्पादन का 40 फीसदी चीनी बिहार से आता था, अब यह मुश्किल से 4 फीसदी रह गया है। आजादी से पहले बिहार में 33 चीनी मिलें थीं, अब 28 रह गई हैं। इसमें से भी 10 निजी प्रबंधन में चल रही हैं। जिनमें बगहा और मोतिहारी की स्थिति जर्ज़र हो चुकी है। जहाँ सकरी का अस्तित्व मिट चुका है और रैयाम चीनी मिल अपनी दुर्दशा पर आँशु बहा रहा है वहीँ सबसे पुराना लोहट चीनी मिल अपने उद्धारक का इन्तेजार कर रहा है। क्या है बिहार में चीनी मीलों का इतिहास और वर्तमान की शोधपरक रिपोर्ट में पत्रकार नीलू कुमारी और सुनील कुमार झा ने कई पहलूओं और कारणों पर प्रकाश डाला है। यह आलेख निश्चित रूप से आपकी जिज्ञासा शांत करेगा। - समदिया
शर्करा से चीनी तक - चीनी का प्रयोग भारत में कब से हो रहा है ये शायद अभी ज्ञात नहीं हो पा रहा है लेकिन अथर्ववेद और रामायण में एक से कही ज्यादा बार इसका प्रयोग (चीनी शब्द संस्कृत के शर्करा, और प्राकृत के सक्कर शब्द से व्युत्पित हुआ है ) ये दिखाता है की चीनी भारत में करीब ३००० वर्ष पुराना है। मनू, चरक और सूश्रुत संहिता में इसका उल्लेख दवाओं के रूप में किया गया है। मैगस्थनीज और चाणक्य के अर्थशास्त्र (321 से 296 ईपू) में भी इसका उल्लेख है। एक चीनी एनस्कालोपिडिया में यह रिकॉर्ड है की सम्राट ताई सुंग (६२७ से ६५० AD ) के शासनकाल के दौरान चीनी सरकार ने चीनी छात्रो के एक बैच को बिहार भेजा था, ताकि वो गन्ना और चीनी के विनिर्माण की खेती की विधि का अध्यन कर सके। उस वक्त भारत का पूर्वी हिस्सा चीनी उत्पादन में माहारथ हासिल कर चुका था और विदेशों में निर्यात करने लगा था। लेकिन 1453 में इंडोनेशिया पर तुर्क शासन के बाद निर्यात पर अतिरिक्त कर का बोझ बढने से इसके कारोबार पर प्रतिकूल असर पडा। और धीरे धीरे यह कारोबार दम तोड दिया। इधर विदेशों में चीनी की मांग बढती रही।
नील से ईख तक का सफर - 1792 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने विदेशो में उठ रही चीनी की माँग को देखते हुए अपना एक प्रतिनिधि मंडल भारत भेजा। चीनी उत्पादन की संभावनाओं का पता लगाने के लिए लुटियन जे पीटरसन के नेतृत्व में भारत आया प्रतिनिधिमंडल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बंगाल प्रसिडेंसी के तिरहुत ईलाके में न केवल जमीन उपयुक्त है, बल्कि यहां सस्ते मजदूर और परिवहन की सुविधा भी मौजूद है। उस वक्त यह ईलाका नील की खेती के लिए जाना जाता था। इस रिपोर्ट के आने के बाद नील की खेती में मुनाफा कम देख ईलाके के किसान भी ईख की खेती को अपनाने लगे। इधर, ईख पैदावार के साथ ही 1820 में चंपारण क्षेत्र के बराह स्टेट में चीनी की पहली शोधक मिल स्थापित की गयी। मिस्टर स्टीवर्ट की अगुवाई में 300 टन वाले इस कारखाने में ईख रस से आठ फीसदी तक चीनी का उत्पादन होता था। यहां उत्पादित चीनी तिरहुत ईलाके के लोगों को देखने के लिए भी नहीं मिलता था और सारा माल पंजाब समेत पश्चिमी भारत में भेज दिया जाता था। 1877 आते आते पश्चिमी तिरहुत के 5 हजार हैक्टेयर वाली नील की खेती सिमट कर 1500 हैक्टेयर में रह गयी और 2 हजार हैक्टेयर में ईख की खेती शुरू हो गयी। 1903 आते आते ईख ने तिरहुत से नील को हमेशा के लिए विदा कर दिया।
आधुनिक चीनी मिलों का आगमन- तिरहुत का र्ईलाका परिस्कृत चीनी का स्वाद 19वीं शताब्दी में चख पाया, जब यहां चीनी उद्योग का विकास प्रारंभ हुआ। १९०३ से तिरहुत में आधुनिक चीनी मिलों का आगमन शुरू हुआ। 1914 तक चंपारण के लौरिया समेत दरभंगा जिले के लोहट और रैयाम चीनी मिलों से उत्पादन शुरू हो गया। 1918 में न्यू सीवान और 1920 में समस्तीपुर चीनी मिल शुरू हो गया। इस प्रकार क्षेत्र में चीनी उत्पादन की बडी ईकाई स्थापित हो गयी, लेकिन सरकार की उपेक्षा के कारण इसका तेजी से विकास नहीं हो पाया। प्रथम विश्व युद्ध के समय इनकी कुछ प्रगति अवश्य हुई, लेकिन ये विदेशी प्रतियोगी के आगे टिकी नहीं । 1929 तक भारत में यह कारोबार संकटग्रस्त हो गया और देश में चीनी मीलों की संख्या घटकर सिर्फ 32 रह गयी, जिनमें पांच तिरहुत क्षेत्र से थे।
संरक्षण का उठाया फायदा – तिरहुत चीनी उद्योग की यह अवस्था नहीं हुई होती यदि 1920 की चीनी जाँच समिति द्वारा इसके संरक्षण की सिफारिस की गई होती। बाद में सम्राजीय कृषि गवेषणा परिषद् ने ईख उत्पादकों के हितो की रक्षा के लिए चीनी उद्योग को संरक्षण देने की सिफारिश की। फलतः 1932 में पहली बार 7 वर्षो के लिए इस उद्योग को संरक्षण दिया गया। तिरहुत ने इस मौके का भरपूर फायदा उठाया और यहां जिस तीव्रता से इस उद्योग का विकास हुआ वह संरक्षण की सार्थकता को सिद्ध करता है। चार वर्ष के भीतर ही चीनी मीलों की संख्या 7 से बढ़कर 17 हो गयी। चीनी का उत्पादन 6 गुना बढ़ गया, आयात किये गए चीनी यंत्रों का मुल्य 8 गुना बढ़ गया। संरक्षण प्रदान करने के 6 वर्ष के भीतर ही चीनी आयात में साढ़े आठ करोड़ रूपये की कमी हो गयी और केवल 25 लाख रूपये के चीनी का आयत भारत में किया गया। चीनी कंपनियों द्वारा दिया जाने वाला लाभांश जो 1923 और 31 के बीच औसतन 11.2% था बढ़कर 1932 में 19.5% हो गया और 1934 में 17.2% हो गया।
चीनी मामले में आत्म निर्भर – 1937 में चीनी प्रशुल्क बोर्ड ने चीनी उद्योग को दो साल और संरक्षण देने की सिफारिश की। बोर्ड की सिफारिश मंजूर होने के बाद तिरहुत में चीनी की बढती उत्पादकता से 1938 -39 में भारत ना केवल चीनी के मामले में आत्मनिर्भर हो गया था, अपितु अतिरिक्त उत्पादन भी करने लगा था। उद्योग को दिया गया संरक्षण इसका प्रमुख कारण था। दूसरा कारण ये भी था कि दूसरे विश्व युद्ध के कारण कच्चा माल तथा यंत्रों की लागत अत्यंत कम हो गयी थी जो इस उद्योग के प्रसार में सहायक सिद्ध हुआ। लेकिन 1937 में विश्व के 21 प्रमुख चीनी उत्पादक देशो में हुए एक अंतरराष्ट्रीय समझौते से संरक्षण का लाभ प्रभावित हुआ। इस समझौते में निर्यात का कोटा तय हुआ और वर्मा को छोड़कर समुद्र के रास्ते अन्य किसी भी देश में चीनी का निर्यात करने के लिए भारत पर 5 वर्षो के लिए रोक लगा दी गयी। इसके कारण 1942 तक बिहार सहित पूरे भारत में अति उत्पादकता की समस्या पैदा हो गयी। इसलिए कई चीनी मिले निष्क्रिय हो गयी।
आधिपत्य को लेकर बढा तनाव – चीनी की अधिकता से उत्पन्न परिस्थिति का सामना करने के लिए चीनी उत्पादकों ने चीनी संघ की स्थापना की, ताकि चीनी के मूल्य के ह़ास को रोका जा सके। यह संघ अपने सदस्य कारखानों के द्वारा चीनी के बिक्री को सुनिश्चित करने लगा। 1966-67 तक बिहार के निजी मिल मालिकों ने चीनी कंपनियों पर पूरी तरह अपना कब्जा जमा लिया और ऐसी नीति अपनाने लगे ताकि चीनी पर से सरकार का नियत्रण पूर्ण रूप से खत्म हो जाये। इस कारण चीनी मीलों पर मालिकों और सरकार के बीच टकराव बढने लगे। 1972 में केंद्र सरकार द्वारा चीनी उद्योग जाँच समिति की स्थापना की। चीनी उद्योग की स्थिति और समस्या की जांच कर यह समिति 1972 के आखिरी सप्ताह में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने सरकार को चीनी कारखानों का अधिग्रहण करने का सुझाव दिया। फलस्वरूप 1977 से 85 के बीच 15 से ज्यादा चीनी मिलों का अधिग्रहण बिहार सरकार ने किया। इसमें समस्तीपुर (समस्तीपुर शुगर सेन्ट्रल शुगर लिमिटेड ), रैयाम ( तिरहुत कोपरेटिव शुगर कंपनी लिमिटेड ), गोरौल( शीतल शुगर वर्क्स लिमिटेड), सिवान ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), गुरारू ( गुरारू चीनी मिल), न्यू सिवान ( न्यू सिवान शुगर एंड गुर रिफ़ाइनिग कम्पनी), लोहट ( दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बिहटा ( साउथ बिहार शुगर मिल लिमिटेड), सुगौली( सुगौली शुगर वर्क्स लिमिटेड), हथुआ ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), लौरिया ( एस.के.जी. शुगर लिमिटेड), मोतीपुर ( मोतीपुर शुगर फेक्टरी ), सकरी ( दरभंगा शुगर कंपनी लिमिटेड), बनमनखी ( पूर्णिया कोपरेटिव शुगर फेक्टरी लिमिटेड), वारिसलीगंज (वारिसलीगंज कोपरेटिव शुगर मिल लिमिटेड), का अधिग्रहण किया गया।
और बढती गयी मीलों की दुर्दशा - इन मिलों को चलाने के लिए बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की स्थापना 1974 ई० में हुई थी, जो चीनी मिलो के घाटे को नियत्रित कर इसे सुचारू रूप से प्रबंधन करने का काम करता, लेकिन इनमें से ज्यादातर इकाई कीमतों में गिरावट और इनपुट लागत में वृद्धि के दवाब को नहीं झेल सकी। फलस्वरूप एक के बाद एक यूनिट बंद होते चले गये। 1996-97 के पेराई सीज़न के बाद इसको पुनर्जीवित करना बंद हो गया और सारी इकाई बंद पड़ गये। घाटे का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन इकाइयों पर किसानो का 8.84 करोड़ रुपया और कर्मचारियों का 300 करोड़ रुपया बकाया था। 1990 आते आते तिरहुत के ईख की खेती कुछ जिलों तक सिमट कर रह गयी और हजारों हैक्टेयर में गेहूं की खेती शुरू हो गयी। 1997 आते आते गेहूं ने तिरहुत से ईख को नकदी फसल के रूप में विदा कर दिया। सरकार ने रखे हथियार - फरवरी 2006 में बिहार सरकार आखिरकार हथियार रख दिये और यह स्वीकार कर लिया कि वो बंद मिलों को चलाने में असमर्थ है। 1977 में चीनी मिलो के घाटे को नियत्रित कर इसे सुचारू रूप से प्रबंधन करने का दावा झूठा साबित हुआ। मिलों को फिर से चालू करने के लिए सरकार ने गन्ना विकास आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलायी। इसमें समिति ने राय दी कि बिहार स्टेट शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के बंद पड़े चीनी मीलों को पुनर्जीवित करने के लिए एक वित्तीय सलाहकार को नियुक्त किया जाय, जो इन बंद पड़े चीनी मिलो के पुनरुद्धार के लिए कोई सटीक योजना बना सके। इसके तहत एसबीआई कैपिटल को यह काम सौंपा गया। समिति ने अंततः इन इकाइयों के लिए निविदा आमंत्रित करने का फैसला किया और निजी निवेशको आमंत्रित किया कि वो इन बंद पड़े चीनी मिलो को पुनरुद्धार / पुनर्गठन / लीज़ पर ले सके। शुरुआत से ही निवशकों की दिलचस्पी ना के बराबर रही। पिछले साल भी दिसंबर में टेंडर भरने के आखिरी दिन तक तीन चीनी मिलों के लिए सिर्फ छह आवेदन ही मिले हैं।
पुनरुद्धार के नाम पर मिट गया अस्त्तिव - एसबीआई कैपिटल ने परिसंपत्तियों का मूल्यनिर्धारण, परिचालन और वित्तीय मापदंडों के आधार पर बिहार सरकार को एक संक्षिप्त रिपोर्ट दिया। इसके अनुसार बंद पड़ी १५ मीलों में से १४ मीलों को ही केवल फिर से चलाने का सुझाव दिया जबकि सकरी मिल को विलोप करने की बात कही गयी समिति के अनुसार लोहट और रैयाम के बीच स्थित होने के कारण इस मिल के लिए गन्ना अधिकार क्षेत्र उपलब्ध नहीं सकता है। अतः इसके ११५ एकड़ जमीन को किसी अन्य कार्य के लिए आवंटित किया जाना चाहिए। लोहट के मुनाफे से १९३३ में स्थापित ७८२ टीएमटी क्षमता वाले इस मिल के वजूद को खत्म कर दिया गया। इस प्रकार बिहार के चीनी मीलों के इतिहास में सकरी पहली इकाई रही जो केवल बंद ही नहीं हुई बल्कि उसे हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। सरकार के इस पहल से ऐसा भी नहीं की अन्य मिलें पुनर्जीवित हो गयी सकरी और रैयाम को महज़ 27.36 की बोली लगाकर लीज़ पर लेने वाली कंपनी तिरहुत इंडस्ट्री ने नई मशीन लगाने के नाम पर रैयाम चीनी मिल के सभी साजो सामान बेच चुकी है। २००९ में २०० करोड़ के निवेश से अगले साल तक रैयाम मिल को चालु कर देने का दावा करने वाली यह कम्पनी मिल की पुरानी सम्पति को बेचने के अलावा अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं कर सकी। वैसे बिहार सरकार ने अब तक कुल ५ मीलों को निजी हाथों में सौंपा है जिनमे से केवल दो सुगौली और लौरिया चीनी मिल एक बार फिर चालू हो पाई है जबकि रैयाम और सकरी मीलों का भविष्य निजी हाथों में जाने के वाबजूद अंधकारमय है।
इथेनॉल ने बढा दी मुश्किल - निवेशकों की रुचि चीनी उत्पादन में कम ही रही, वे इथेनॉल के लिए चीनी मिल लेना चाहते थे, जबकि राज्य सरकार को यह अधिकार नहीं रहा। क्योंकि 28 दिसंबर, 2007 से पहले गन्ने के रस से सीधे इथेनॉल बनाने की मंजूरी थी। उस समय बिहार में चीनी मिलों के लिए प्रयास तेज नहीं हो सका, जब प्रयास तेज हुआ तब दिसंबर, 2007 को गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 1996 में संशोधन किया गया, जिसके तहत सिर्फ चीनी मिलें ही इथेनॉल बना सकती हैं। इसका सीधा असर बिहार पर पड़ा है। मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं। ऐसे में बंद चीनी मिलों को चालू करा पाना एक बड़ी चुनौती आज भी है। जानकारों का कहना है की राज्य सरकार पहले पांच साल के कार्यकाल में निवेशकों का भरोसा जीतने का प्रयास करती रही। अब जब निवेशकों की रुचि जगी है, तब केंद्र ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की मांग को खारिज कर राज्य में बड़े निवेश को प्रभावित कर दिया है। जो निवेशक चीनी मीलों को खरीदने के शुरुआती दौर में इच्छा प्रकट की थी वो भी धीरे धीरे अपने प्रस्ताव वापस लेते चले गये।
फिर चाहिए संरक्षण – पिछले पेराई मौसम में 5.07 लाख टन के रिकार्ड उत्पादन के बावजूद चीनी मिलों को करीब 250 करोड का घाटा सहना पड रहा है। बिहार में गन्ने से चीनी की रिकवरी की दर 9.5 फीसदी से घटकर 8.92 फीसदी हो गयी है। बिहार में चीनी का उत्पादन मूल्य करीब 3600 प्रति क्विटल है, जबकि चीनी का मूल्य घटकर 2950 प्रति क्विटंल हो गया है। छोआ का दाम राज्य सरकार ने 187 रुपये तय कर रखा है जबकि उत्तरप्रदेश में इसकी कीमत 300 से 325 रुपये प्रति क्विंटल है। इसी प्रकार स्प्रीट की कीमत बिहार में महज 28 रुपये प्रति लीटर है जबकि उत्तरप्रदेश में 33 से 35 रुपये प्रति लीटर है। ऐसे में बिहार शूगर मिल एसोसिएशन ने सरकार से कैश सब्सिडी 17 की जगह 30 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग की है। ऐसे में बिहार के चीनी उद्योग को एकबार फिर संरक्षण की जरुरत हैं। चीनी उद्योग को लेकर बिहार की मीठी यादें यह विश्वास दिलाती है कि आज की कडवी सच्चाई कल एक नयी तसवीर बनकर सामने आयेगी।
साभार - इसमाद.कॉम

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

2014 का हाल- बंपर पैदावार मगर किसान कंगाल


मानसून के विपरीत होने के बावजूद देश के किसानों ने खून-पसीना एक कर दिया, बारिश की कमी डीजल में पैसे फूंक कर की और देश को भरपूर अनाज उपजा कर दिया. मगर जब उन्हें कीमत मिलने का वक्त आया तो खरीद एजेंसियों ने ढीला-ढाला रवैया अपनाना शुरू कर दिया. बिहार जैसे राज्य में अब तक किसी जिले में धान की सरकारी खरीद ठीक से शुरू तक नहीं हो पायी है. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब का भी वही हाल है. छत्तीसगढ़ ने धान खरीद पर 15 क्विंटल की सीलिंग कर दी है. केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को चेतावनी दे दी है कि अपनी तरफ से बिल्कुल बोनस न दें. देश की तमाम खोखली बहसों के बीच यह सवाल कहीं गुम हो गया है. कृषि विशेषज्ञ दविंदर शर्मा ने इस सवाल के पीछे की सच्चाई को बारीकी से पकड़ा है. दरअसल अनाज भंडार पिछले साल की पैदावार से ही भरे हैं. लिहाजा एजेंसियां किसानों की पैदावार खरीदने को इच्छुक नहीं है. इसके अलावा एक सोच सी बन गयी है कि किसानी को हतोत्साहित किया जाये ताकि भूमि अधिग्रहण के मसलों में अधिक परेशानी न हो. देश के विकास का मतलब औद्योगिक विकास मान लिया गया है. इन्ही मसलों पर उनका यह आलेख किसानी की मौजूदा हालत को समझने के लिए मौजू है...
मानसून की नाफरमानियों के बावजूद साल 2014 में रिकार्ड कृषि उत्पादन दर्ज किया गया. लेकिन उत्पादन में बढोतरी किसानों की आमदनी में उछाल लाने में कामयाब नहीं हो पायी. यह साल किसानों के लिए निराशा भरा साल बनकर रह गया.
कृषि वर्ष 2013-14 में जो जून 2014 में समाप्त हुआ देश के किसानों ने 264,400,000 टन खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन किया. खाद्यान्नों के साथ-साथ तिलहन, मक्का, कपास और दलहन के उत्पादन में भी भारी उछाल देखा गया. तिलहन का उत्पादन 4.8 प्रतिशत की छलांग के साथ 3.45 करोड़ टन के रिकार्ड उत्पादन स्तर पर पहुंच गया. मक्का उत्पादन 24,200,000 टन के स्तर तक पहुंचा और 8.52 फीसदी की वृद्धि हुई. दलहन उत्पादन 19,600,000 टन दर्ज किया गया जो पिछले साल के मुकाबले फीसदी 7.10 अधिक था. कपास उत्पादन ने भी रिकार्ड ऊंचाई को छुआ. खरीफ 2014 में भी मानसून की बारिश में कमी के बावजूद किसानों ने चावल, मक्का और कपास का बंपर उत्पादन किया.
देश के किसानों ने यह रिकार्ड उत्पादन मानसून के कमजोर रहने के बावजूद किया लिहाजा इसका पूरा क्रेडिट उनकी मेहनत और सूझबूझ को जाता है. वस्तुतः आर्थिक स्थिति में सबसे निचले स्तर पर रहने के बावजूद इस देश के किसानों ने कभी राष्ट्र को असफल नहीं किया है. शायद इस बात का मर्म समझने की वजह से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू कराने का वादा किया था जिससे किसानों को अधिक आमदनी हो सके. उस वक्त वादा किया गया था कि किसानों को उत्पादन की लागत पर 50 फीसदी का लाभ सुनिश्चित किया जायेगा.
लेकिन हकीकत यह है कि किसानों को चावल और गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में सिर्फ 50 रुपये की बढ़ोतरी का उपहार मिला है जो पिछले साल के मुकाबले महज 3.6 प्रतिशत अधिक है. यह बढ़ोतरी उतनी भी नहीं है कि किसान मुद्रास्फीति के बोझ का भी मुकाबला कर पाये. विडंबना तो यह है कि इस साल बासमती चावल और कपास की कीमतों में गिरावट दर्ज की गयी. यह तब है जब बासमती चावल का उत्पादन पंजाब और हरियाणा में दोगुना हो गया है. ऐसे में किसानों को इस साल अपना बासमती 1600-2400 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. पिछले साल उन्हें इस चावल की कीमत 3261 से 6085 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हासिल हुई थी.
कपास की कीमतें भी इस साल रुपये प्रति क्विंटल 3,000 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गयी. यह पिछले साल 4400 से 5200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हुआ करती थी. ऐसे में सरकार के निर्देश पर भारतीय कपास निगम को किसानों का कपास 3750 की खरीद मूल्य पर खरीदना पड़ा. हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि पंजाब औऱ हरियाणा में बासमती के रिकार्ड उत्पादन की वजह वहां के किसानों द्वारा डीजल पंप का भरपूर संचालन है. 50 फीसदी कम बारिश होने की वजह से किसानों ने पंप चलाने में क्षमता से अधिक पैसा डीजल के लिए खर्च किया था.
इस पर से किसानों पर एक औऱ चोट इस रूप में पड़ी कि खाद्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर दिया कि वे एमएसपी पर कोई बोनस प्रदान नहीं करें. अगर राज्य सरकार बोनस देते हैं तो मंत्रालय खरीद प्रक्रिया से हाथ खींच लेगा. राज्य सरकारों को भी सलाह दी गयी कि वे कम खरीद करें क्योंकि भंडार में पहले से ही काफी खाद्यान्न जमा है. दूसरे शब्दों में, किसानों को बाजारों की अनियमितता का सामना करने के लिए छोड़ दिया गया है.
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) धीरे-धीरे खरीद संचालन से अपना हाथ खीच रहा है, ऐसे में बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पंजाब में सरकारी खरीद में जानबूझकर देरी के उदाहरण सामने आ रहे हैं. छत्तीसगढ़ में कभी वादा किया गया था कि किसानों के धान का एक-एक दाना खरीद लिया जायेगा मगर इस साल हर किसान से अधिकतम 10 क्विंटल ही खरीदने की बात की जा रही थी. विरोध प्रदर्शन के बाद, यह सीमा प्रति किसान 15 क्विंटल की गयी. पंजाब में किसानों को मौके पर भुगतान करने की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है. जैसे संदेश दिया जा रहा हो कि चावल का अधिक उत्पादन नहीं करें.
ऐसे समय में जब खेती से पहले से ही आमदनी घट रही है और ऋणग्रस्तता बढ़ती जा रही है, यह विफलता किसानों को और अधिक हतोत्साहित करेगी. भूमि अधिग्रहण कानून को और सरल बनाने और इसमें बहु फसलीय खेतों को भी शामिल करने का मतलब ही यही है कि भारतीय किसान देश के औद्योगिक विकास के लिए कुरबान हो जायें. अब आर्थिक विकास की तमाम बातें औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित हो गयी हैं. ऐसे में इसका असर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ना ही पड़ना है.
इसका असर खेती के लिए बजटीय प्रावधानों पर भी देखा जा सकता है. 2013 के बजट में जहां खेती के लिए 19,307 करोड़ रुपये ही जारी किये गये थे जो कुल बजट का एक फीसदी से भी कम था. इस साल अरुण जेटली ने कृषि को 22,652 करोड़ रुपये का बजट उपलब्ध कराया है.
उनके ब्लॉग ग्राउंड रियलिटी से साभार, अनुवाद- पुष्यमित्र