मानसून के विपरीत होने के बावजूद देश के किसानों ने खून-पसीना एक कर दिया, बारिश की कमी डीजल में पैसे फूंक कर की और देश को भरपूर अनाज उपजा कर दिया. मगर जब उन्हें कीमत मिलने का वक्त आया तो खरीद एजेंसियों ने ढीला-ढाला रवैया अपनाना शुरू कर दिया. बिहार जैसे राज्य में अब तक किसी जिले में धान की सरकारी खरीद ठीक से शुरू तक नहीं हो पायी है. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब का भी वही हाल है. छत्तीसगढ़ ने धान खरीद पर 15 क्विंटल की सीलिंग कर दी है. केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को चेतावनी दे दी है कि अपनी तरफ से बिल्कुल बोनस न दें. देश की तमाम खोखली बहसों के बीच यह सवाल कहीं गुम हो गया है. कृषि विशेषज्ञ दविंदर शर्मा ने इस सवाल के पीछे की सच्चाई को बारीकी से पकड़ा है. दरअसल अनाज भंडार पिछले साल की पैदावार से ही भरे हैं. लिहाजा एजेंसियां किसानों की पैदावार खरीदने को इच्छुक नहीं है. इसके अलावा एक सोच सी बन गयी है कि किसानी को हतोत्साहित किया जाये ताकि भूमि अधिग्रहण के मसलों में अधिक परेशानी न हो. देश के विकास का मतलब औद्योगिक विकास मान लिया गया है. इन्ही मसलों पर उनका यह आलेख किसानी की मौजूदा हालत को समझने के लिए मौजू है...

मानसून की नाफरमानियों के बावजूद साल 2014 में रिकार्ड कृषि उत्पादन दर्ज किया गया. लेकिन उत्पादन में बढोतरी किसानों की आमदनी में उछाल लाने में कामयाब नहीं हो पायी. यह साल किसानों के लिए निराशा भरा साल बनकर रह गया.
कृषि वर्ष 2013-14 में जो जून 2014 में समाप्त हुआ देश के किसानों ने 264,400,000 टन खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन किया. खाद्यान्नों के साथ-साथ तिलहन, मक्का, कपास और दलहन के उत्पादन में भी भारी उछाल देखा गया. तिलहन का उत्पादन 4.8 प्रतिशत की छलांग के साथ 3.45 करोड़ टन के रिकार्ड उत्पादन स्तर पर पहुंच गया. मक्का उत्पादन 24,200,000 टन के स्तर तक पहुंचा और 8.52 फीसदी की वृद्धि हुई. दलहन उत्पादन 19,600,000 टन दर्ज किया गया जो पिछले साल के मुकाबले फीसदी 7.10 अधिक था. कपास उत्पादन ने भी रिकार्ड ऊंचाई को छुआ. खरीफ 2014 में भी मानसून की बारिश में कमी के बावजूद किसानों ने चावल, मक्का और कपास का बंपर उत्पादन किया.
देश के किसानों ने यह रिकार्ड उत्पादन मानसून के कमजोर रहने के बावजूद किया लिहाजा इसका पूरा क्रेडिट उनकी मेहनत और सूझबूझ को जाता है. वस्तुतः आर्थिक स्थिति में सबसे निचले स्तर पर रहने के बावजूद इस देश के किसानों ने कभी राष्ट्र को असफल नहीं किया है. शायद इस बात का मर्म समझने की वजह से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू कराने का वादा किया था जिससे किसानों को अधिक आमदनी हो सके. उस वक्त वादा किया गया था कि किसानों को उत्पादन की लागत पर 50 फीसदी का लाभ सुनिश्चित किया जायेगा.
लेकिन हकीकत यह है कि किसानों को चावल और गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में सिर्फ 50 रुपये की बढ़ोतरी का उपहार मिला है जो पिछले साल के मुकाबले महज 3.6 प्रतिशत अधिक है. यह बढ़ोतरी उतनी भी नहीं है कि किसान मुद्रास्फीति के बोझ का भी मुकाबला कर पाये. विडंबना तो यह है कि इस साल बासमती चावल और कपास की कीमतों में गिरावट दर्ज की गयी. यह तब है जब बासमती चावल का उत्पादन पंजाब और हरियाणा में दोगुना हो गया है. ऐसे में किसानों को इस साल अपना बासमती 1600-2400 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा. पिछले साल उन्हें इस चावल की कीमत 3261 से 6085 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हासिल हुई थी.
कपास की कीमतें भी इस साल रुपये प्रति क्विंटल 3,000 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गयी. यह पिछले साल 4400 से 5200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच हुआ करती थी. ऐसे में सरकार के निर्देश पर भारतीय कपास निगम को किसानों का कपास 3750 की खरीद मूल्य पर खरीदना पड़ा. हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि पंजाब औऱ हरियाणा में बासमती के रिकार्ड उत्पादन की वजह वहां के किसानों द्वारा डीजल पंप का भरपूर संचालन है. 50 फीसदी कम बारिश होने की वजह से किसानों ने पंप चलाने में क्षमता से अधिक पैसा डीजल के लिए खर्च किया था.
इस पर से किसानों पर एक औऱ चोट इस रूप में पड़ी कि खाद्य मंत्रालय ने राज्य सरकारों को निर्देश जारी कर दिया कि वे एमएसपी पर कोई बोनस प्रदान नहीं करें. अगर राज्य सरकार बोनस देते हैं तो मंत्रालय खरीद प्रक्रिया से हाथ खींच लेगा. राज्य सरकारों को भी सलाह दी गयी कि वे कम खरीद करें क्योंकि भंडार में पहले से ही काफी खाद्यान्न जमा है. दूसरे शब्दों में, किसानों को बाजारों की अनियमितता का सामना करने के लिए छोड़ दिया गया है.
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) धीरे-धीरे खरीद संचालन से अपना हाथ खीच रहा है, ऐसे में बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पंजाब में सरकारी खरीद में जानबूझकर देरी के उदाहरण सामने आ रहे हैं. छत्तीसगढ़ में कभी वादा किया गया था कि किसानों के धान का एक-एक दाना खरीद लिया जायेगा मगर इस साल हर किसान से अधिकतम 10 क्विंटल ही खरीदने की बात की जा रही थी. विरोध प्रदर्शन के बाद, यह सीमा प्रति किसान 15 क्विंटल की गयी. पंजाब में किसानों को मौके पर भुगतान करने की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है. जैसे संदेश दिया जा रहा हो कि चावल का अधिक उत्पादन नहीं करें.
ऐसे समय में जब खेती से पहले से ही आमदनी घट रही है और ऋणग्रस्तता बढ़ती जा रही है, यह विफलता किसानों को और अधिक हतोत्साहित करेगी. भूमि अधिग्रहण कानून को और सरल बनाने और इसमें बहु फसलीय खेतों को भी शामिल करने का मतलब ही यही है कि भारतीय किसान देश के औद्योगिक विकास के लिए कुरबान हो जायें. अब आर्थिक विकास की तमाम बातें औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित हो गयी हैं. ऐसे में इसका असर देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ना ही पड़ना है.
इसका असर खेती के लिए बजटीय प्रावधानों पर भी देखा जा सकता है. 2013 के बजट में जहां खेती के लिए 19,307 करोड़ रुपये ही जारी किये गये थे जो कुल बजट का एक फीसदी से भी कम था. इस साल अरुण जेटली ने कृषि को 22,652 करोड़ रुपये का बजट उपलब्ध कराया है.
उनके ब्लॉग ग्राउंड रियलिटी से साभार, अनुवाद- पुष्यमित्र
नयी सरकार ने जो आनन-फानन में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश जारी कर दिया है, इसकी स्वभाविक तौर पर हर तबके में आलोचना हो रही है. मगर पीके और पाइथागोरस की बहस में यह मुद्दा उतना स्पेस नहीं हासिल कर पाया जितना इसका महत्व था. दुनिया का जो यह नया दौर है उसमें कॉरपोरेट कंपनियों और पूंजीपतियों की निगाह प्राकृतिक संसाधन को कब्जाने पर है. अभी गांव के लोगों के पास अपनी जमीन और अपना आसमान है. मिट्टी और पानी है. मगर इस पर पैसे वालों की निगाह है और सरकार प्रोपर्टी डीलर की भूमिका में है. इसलिए गांव के लोगों को इस मुद्दे पर खास ध्यान देने और भरपूर विरोध करने की जरूरत है. इस अध्यादेश के पक्ष में सरकार के मंत्री अरुण जेटली ने बताया है कि हड़बड़ी क्या थी. आप इस आलेख को पढ़िये औऱ सरकार की मंशा को समझने की कोशिश कीजिये... (मोडरेटर)
अरुण जेटली
31 दिसम्बर 2014 को सरकार ने ‘भूमि अधिग्रहण, पुनव्र्यवस्थापन एवं पुनर्वास में पारदर्शिता और न्यायोचित मुआवजे का अधिकार (संशोधन) अधिनियम 2013’ के कुछ प्रावधानों का संशोधन करने के लिए अध्यादेश जारी किया। 2013 में बने इस कानून को आखिर संशोधित करने की जरूरत क्यों पड़ी और इन संशोधनों का क्या प्रभाव पड़ेगा?
यह बार-बार उल्लेख किया गया है कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 अपनी प्रासंगिकता खो चुका है और इसमें संशोधन की जरूरत है। सचमुच ही इसमें संशोधन चाहिए था। इस कानून के मुआवजे के प्रावधान बिल्कुल ही अपर्याप्त हैं और इसलिए इस बात की जबरदस्त जरूरत थी कि उच्च मुआवजे के साथ-साथ पुनर्वास और निपटान पैकेज भी उपलब्ध करवाया जाए। 2013 के कानून में यह सब किया गया था और इसी आधार पर मैं इस कानून का समर्थन करता हूं। फिर भी भूमि अधिग्रहण का प्रावधान करने वाले संसद के 13 कानूनों को इस अधिनियम के चौथे शैड्यूल में डाल दिया गया। 2013 के कानून की धारा 105 ने इन 13 कानूनों को इसके खुद के प्रभाव क्षेत्र से मुक्त करार दे दिया। इस धारा में यह प्रावधान था कि सरकार अधिसूचना जारी कर सकती है और मुआवजा या पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थापन से संबंधित कानून के किसी भी प्रावधान को इन मुक्त करार दिए कानूनों पर लागू कर सकती है। लेकिन इस प्रस्तावित अधिसूचना को 30 दिन की अवधि के लिए संसद के सुपुर्द करना होता था और संसद से उम्मीद थी कि वह इसको स्वीकार, अस्वीकार या संशोधित कर सकती है।
अध्यादेश जारी करने की जरूरत इसलिए पड़ी कि इस प्रकार की अधिसूचना संसद के जुलाई-अगस्त 2014 बजट सत्र से पहले दायर की जानी थी और इसके अनुरूप इसकी मंजूरी या नामंजूरी प्राप्त होनी थी। चूंकि 31 दिसम्बर 2014 इस प्रकार की अधिसूचना जारी करने के लिए अंतिम दिन था। इसलिए सरकार ने धारा 105 को संशोधित करने और 2013 के अधिनियम के प्रावधान मुआवजा तथा पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थापन से संबंधित 13 उन्मुक्त कानूनों पर लागू करने का फैसला किया।
इस प्रावधान के माध्यम से वर्तमान अध्यादेश में यह व्यवस्था की गई है कि यदि इन उक्त 13 उन्मुक्त कानूनों में से किसी के भी अंतर्गत भूमि अधिग्रहण किया गया है तो किसानों को मुआवजे की बढ़ी हुई राशि का भुगतान किया जाएगा। 2013 के कानून की तुलना में भी यह अध्यादेश एक कदम आगे है। इसी कारण सरकार को वर्ष के आखिरी दिन अध्यादेश जारी करने की जल्दी थी क्योंकि ऐसा न करने की स्थिति में 2013 के कानून के अंतर्गत अनुमोदन की जटिल प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अपने कर्तव्यों का वहन ही नहीं कर सकती।
2013 के कानून में अनेक मामलों में अलग-अलग सीमा तक भू-स्वामी की रजामंदी हासिल करने का प्रावधान है। भू-स्वामी द्वारा रजामंदी व्यक्त करने के बाद ही सरकार भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। इसके बाद कानून में प्रावधान है कि इस भूमि ग्रहण के सामाजिक प्रभाव का विस्तृत अध्ययन करवाया जाए। इससे भी आगे जाते हुए इसमें खाद्य सुरक्षा के संबंध में विशेष प्रावधान है।
ऐतिहासिक रूप में कोई भी भूमि अधिग्रहण स्वायत्त सत्ता की अपनी मर्जी पर निर्भर करता है। सत्ता तंत्र को किसी भी प्रकार के विकास के लिए भूमि की जरूरत होती है। आवास, टाऊनशिप, शहरीकरण, उपनगरीयनकरण, औद्योगीकरण, ग्रामीण व देहाती आधारभूत ढांचा, सिंचाई और भारत की रक्षा के लिए भूमि की जरूरत पड़ती है। यह सूची बहुत लम्बी हो सकती है। निजी हितों पर व्यापक सार्वजनिक हितों को सदा ही प्राथमिकता देनी होती है।
फिर भी जिस भू-स्वामी को सदा के लिए भूमि से वंचित होना पड़ता है उसे सामान्य से कुछ अधिक मुआवजा देना होता है। अधिग्रहण की अत्यंत जटिल प्रक्रिया के कारण भूमि अधिग्रहण केवल मुश्किल ही नहीं बल्कि लगभग असंभव हो गया है जिससे भारत का विकास आहत हो रहा है। जब 21वीं शताब्दी में 1894 में बने कानून का संशोधन किया जाता है तो इसमें 21वीं शताब्दी के अनुरूप ही मुआवजे का प्रावधान चाहिए और साथ ही 21वीं शताब्दी की विकास जरूरतों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसा संशोधन समाज की विकास जरूरतों की पूरी तरह अनदेखी नहीं कर सकता।
मौजूदा संशोधन में 5 ऐसे अपवादों के लिए भी गुंजाइश रखी है जिन पर अधिग्रहण की जटिल प्रक्रिया लागू नहीं होगी। फिर भी मुआवजे के प्रावधान में कोई बदलाव नहीं होगा। इन 5 अपवादित उद्देश्यों की चर्चा नीचे की गई है-
*भारत की रक्षा व सुरक्षा को अपवादित उद्देश्य करार दिया गया है। 2013 के कानून में इस प्रावधान की पूरी तरह अनदेखी की गई थी।
*विद्युतीकरण सहित देहाती आधारभूत ढांचा भी अपवादित उद्देश्यों में शामिल होगा। सड़कों, राजमार्गों, फ्लाईओवर, विद्युतीकरण और सिंचाई से किसानों की जमीन का मूल्य बढ़ेगा। यह अपवाद पूरी तरह ग्रामीण भारत के हित में है।
*गरीब लोगों के लिए घर और सस्ते आवास भी अपवादित उद्देश्य है। देहाती क्षेत्रों से शहरों की ओर आबादी का बहाव और उपनगरीय क्षेत्रों में रोजगार के मौके एक वास्तविकता हैं। इस अपवाद से उन लोगों को लाभ होगा जो ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन करते हैं।
*औद्योगिक कॉरीडोर जो विभिन्न राजमार्गों के साथ-साथ दूर तक एक संकरी पट्टी के रूप में फैले हुए हैं संबंधित देहाती क्षेत्रों के समग्र विकास को बढ़ावा देते हैं। दिल्ली, मुम्बई औद्योगिक कॉरीडोर को उन हजारों गांवों के लिए लाभदायक होगा जो राष्ट्रीय राजमार्गों के दोनों ओर बसे हुए हैं। ग्रामीण लोगों के लिए इससे भला बेहतर मौका क्या हो सकता है कि उनके अपने ही खेतों के करीब औद्योगिक कॉरीडोर स्थित हो। इससे जहां उनकी भूमि का मूल्य बढ़ेगा वहीं रोजगार के मौके भी पैदा होंगे।
*आधारभूत ढांचा और सामाजिक अधोसंरचना परियोजनाएं (इनमें वह पी.पी.पी. परियोजनाएं भी शामिल हैं जिनमें भू-स्वामित्व विभिन्न सरकारों के पास रहता है)। इससे पूरे देश को और खास तौर पर उन ग्रामीण क्षेत्रों को लाभ होगा जहां न तो कोई आधारभूत विकास ढांचा है और न ही पर्याप्त सामाजिक अधो-संरचना।
लगभग इन सभी अपवादित उद्देश्यों से ग्रामीण भारत लाभान्वित होगा। इनसे भूमि का मूल्यवर्धन होगा, रोजगार के मौके पैदा होंगे और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर आधारभूत ढांचा तथा सामाजिक अधो-संरचना उपलब्ध होगी। यह लाभ उक्त 13 अपवादित कानूनों को भी अध्यादेश की परिधि में लाने के फलस्वरूप मिलने वाले बढ़े हुए मुआवजे और पुनर्वास एवं निपटान प्रावधानों के अतिरिक्त होंगे।
इसलिए यह संशोधन भारत की, खासतौर पर ग्रामीण भारत विकास जरूरतों को संतुलित करते हुए भू स्वामियों को अधिक मुआवजे का प्रावधान करता है। जो पाॢटयां इस अध्यादेश का विरोध करती हैं क्या उनके द्वारा शासित राज्यों की सरकारें सार्वजनिक रूप में ऐसी घोषणा करेंगी कि वे समाज की, खासतौर पर इसके गरीब और कमजोर वर्गों की, विकास जरूरतों को संतुलित करने के साथ-साथ देश की रक्षा जरूरतों का संज्ञान लेते हुए अधिक मुआवजा उपलब्ध करवाने वाले इस कानून का उपयोग नहीं करेंगी?
2013 के अधिनियम की इबारत में ही 50 से अधिक गलतियां थीं। इन गलतियों को ठीक करने के लिए अलग से प्रावधान किया गया। कुछेक को तो अध्यादेश के माध्यम से सुधारा जा रहा है। पूर्ववर्ती प्रावधान निश्चय ही नुक्सदार था जिसमें यह दर्ज था कि अनोपयुक्त भूमि अधिग्रहण के 5 वर्ष के बाद भू-स्वामियों को वापस करनी होगी। रक्षा, उद्योग, विज्ञान, सिंचाई, राजमार्ग इत्यादि से संबंधित परियोजनाएं और औद्योगिक कॉरीडोर, स्मार्ट सिटी, डाऊनशिप, व्यावसायिक इत्यादि अनेक वर्षों में पूरे होते हैं। 5 वर्ष में तो इनको खड़े भी नहीं किया जा सकता। यदि पूर्व प्रावधान को निष्प्रभावी नहीं किया जाता तो अनेक परियोजनाएं नुक्सदार कानून के कारण ही अधर में लटकी रह जातीं।
2013 के कानून में तो बहुत जोर- शोर से यह प्रावधान किया गया था कि अधिगृहीत भूमि का किसी निजी शैक्षणिक संस्थान या अस्पताल के लिए उपयोग नहीं हो सकेगा। तो क्या नए स्मार्ट सिटी अस्पतालों व स्कूलों के बिना ही अस्तिव में आएंगे? अब अध्यादेश में प्रावधान किया गया है कि अधिगृहीत भूमि पर अस्पताल व शिक्षण संस्थान भी बन सकेंगे।
आधुनिक राष्ट्रीय रूप में विकसित हो रहे भारत को संतुलित पहुंच की जरूरत है। भू-स्वामी के साथ भी न्याय होना चाहिए और इसके समानांतर ही विकास जरूरतों का भी संज्ञान लिया जाना चाहिए। दोनों में से कोई बात भी एक-दूसरे कीमत पर नहीं हो सकती। संशोधित अध्यादेश व्यापक परामर्श पर अधारित है और विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा शासित राज्यों की सरकारों ने इसके किए गए बदलावों को समर्थन दिया है। जो इसका विरोध कर रहे हैं, वे निश्चय ही यह प्रभाव पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी पार्टी की सरकारें इस अध्यादेश के प्रावधानो को उपयुक्त नहीं करेंगी। प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद के इस दौर में ऐसे राज्य अवश्य ही पिछड़ जाएंगे और इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा।
पंजाब केसरी से साभार
सब्सिडी वाला कृषि उपकरण गरीब किसानों की नसीब में कहां. इसके लिए बड़े पहुंच की जरूरत होती है. ऐसे में गरीब लोग जुगाड़ लगाकर अपने लिए कृषि उपकरण बना लेते हैं. ऐसे ही एक उपकरण की तसवीर पूर्णिया के किसान और लेखक गिरींद्रनाथ के फेसबुक वाल पर दिखी. वे इस तरह का परिचय देते हुए लिखते हैं-
कितने जुगाड़ू हो गए हैं अंचल के लोगबाग. यह तस्वीर उसी का जीता-जागता उदाहरण है। महेंद्रा कंपनी की पुरानी जीप का अगला हिस्सा वो भी बिना लाइट के, पंप सेट का इंजन...आदि-आदि मिलाकर यह वाहन तैयार हुआ है ...
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गिरीन्द्रनाथ झा
अंचल में आने के बाद जिस शब्द से मैं अक्सर परेशान रहता हूं उसमें एक है ‘जमीन’। जिसे मैं कल तक धरती -भूमि या माटी कहता था उसे यहां आकर ‘जमीन’ कहने लगा हूं। शाम की शुरुआत में यह पोस्ट लिखते वक्त मुझे कॉलेज के दिनों में पढ़े एक बांग्ला उपन्यास ‘भूमि पुत्र’ की याद आ रही है। उपन्यास का नायक हमेशा “भूमि” के नशे में रहता था, आप सोच रहे होंगे कि ये कैसा नशा है? तो साहेबान भूमि का नशा किसी भी नशे से बढ़कर है। उपन्यास का नायक भूमि में ही रमा रहता था। अंचल में आने के बाद ही ‘भूमिपुत्र’ की कथा वस्तु को समझ पाया हूं।
अंचल में कोसी प्रोजेक्ट के नहर पर ऊंचाई से खेतों में पसरे हरे-हरे धान को निहारते हुए कभी कभी मैं भी जमीन के मालिकाना हक की एबीसीडी पढ़ने की कोशिश करता हूं तो लगता है कि माया का फेर यही है और शायद जीवन जीने की ललक भी यही है। सच कहूं तो मुझे जमीन की कथाएं भी नहर की भांति लगती है। कभी पानी तो कभी सूखा लेकिन जीने की आशा उसी पर टिकी रहती है। जमीन और नहर उस वक्त मेरे लिए एक समान लगने लगता है। मैं दोनों के हाव-भाव पढ़ने लगता हूं। मेरे जीवन में एक ऐसा भी वक्त था जब ऐसे रंगों से परहेज करता था लेकिन अब मैं उसी डफली में जीवन का राग आलापने लगा हूं।
बाउंड्री, अमीन, जमीन जैसे शब्द मुझे रंगरेज की तरह खींचने लगे हैं। सर्वे-सेटलमेंट-डिग्री.सिलिंग आदि शब्दों से ममत्व बढ़ गया है। दोस्त-यार कहते हैं कि अब मैं मायावी हो गया हूं। लेकिन सच कहूं तो इन सबके बीच भी मेरा मानुष बुदबुदाते रहता है- “ हर करम के कपड़े मैले हैं.....“ क्योंकि मन तो साफ नहीं रहा। जमीन कुछ सीखाए या सीखाए, प्रपंच तो जरुर सीखाता है। ऐसा मेरा मानना है।
मैं इस प्रपंच पर लंबी कथा बांच सकता हूं। ऐसी कथाएं अंचल में चलती रहती है। कबीराहा मठों पर भी इन कथाओं के नायक मुझे दिख जाते हैं। पिछली बरसात कटिहार जिले के एक कबिराहा मठ पर बैठा था तो एक ने कहा कि जीवन के प्रपंच में कपड़े सफेद रह जाएं यह संभव नहीं है। बरसात की उस दोपहर में भूमि पुत्र का नायक मेरे दिमाग में फिर चहलकदमी करने लगा था। हमने जान लिया कि अंचल के जीवन में प्रपंच ही मन रुपी कपड़े को मैला करता। इन सबके फेर में मेरे लिए फायदे की बात यह रही है कि बचपन में गणित से डरने वाला छात्र जीवन में अब अर्थशास्त्र के संग डुबकी लगाने लगा है।
खैर, अंचल में जिद की कथा ऐसे ही चलती है। मन जिद्दी होने चला है लेकिन मन पर लगाम कसने के लिए अभ्यास की जरुरत है। मेरा ध्यान गीता में छपे उस श्लोक पर टिक जाता है, जिसमें कृष्ण कहते हैं- “मन चंचल बहुत है,पर मन को वैराग्य और अभ्यास से वश में किया जा सकता है।“ लेकिन सच कहूं तो मैं इन अभ्यासों से अभी दूर रहना चाहता हूं। दरअसल अंचल में पांव फैलाने के बाद मेरे हिस्से में जिद्दी मन भी आ टपका है। मैं जिद को जीवन के अवयव की तरह देखना चाहता हूं। देखिए न यह लिखते वक्त उसके भीतर फिल्म ‘गुलाल’ का यह गीत भी बज चला है-
“चल तो तू पड़ा है,
फासला बड़ा है,
जान ले
अंधेरे के सर पे खून चढा है
मुकाम खोज ले तू
मकान खोज ले तू …
गिरीन्द्रनाथ झा के ब्लॉग अनुभव से साभार
पशुपालन है भूमिहीन परिवारों की जीविका का मुख्य आधार- एनएसएसओ की रिपोर्ट
गंवई इलाकों में सबसे गरीब लोगों के लिए पशुपालन अब भी जीविका का मुख्य स्रोत बना हुआ है। एनएसएसओ की 17 वीं दौर की गणना पर आधारित एक रिपोर्ट के अनुसार जिन खेतिहर परिवारों के पास 0.01 हैक्टेयर या इससे कम रकबे की जमीन है उनमें तकरीबन 20 प्रतिशत परिवार जीविका के लिए मुख्य रुप से पशुपालन पर निर्भर हैं। गौरतलब है कि ऐसे परिवारों में भूमिहीन परिवार भी शामिल हैं।
मखाना की खेती कर रही महिलाएँ
मखाना उत्पादन पूरी तरह से मछुआरा समुदाय की महिलाओं के हाथों में है। पुरुष इस पूरी प्रक्रिया में बस सहयोग करते हैं। उनका काम केवल तालाब से मखाने के तैयार बीजों को तोड़ना होता है। दरअसल मखाने की पत्तियों, तनों और जड़ों में हजारों नुकीले काँटे होते हैं। ये काँटे बीज तोड़ते वक्त बहुत तेज चुभते हैं। बीज तोड़ने में पूरा हाथ जख्मी हो जाता है। इस काम मे पुरुषों का सहयोग केवल यही तक रहता है। इन बीजों को तोड़ने में तकलीफ ना हो, इसके लिए तकनीक सुविधा लेने का विचार हो रहा है। मिथिलांचल में पान और तालाब के बाद अगर कोई पहचान है तो वह है ‘मखाना’। मखाना मिनरल और न्यूट्रियंस से भरपूर होता है। इसके सेवन से कई फायदे मिलते हैं। मिथिला में पैदा होने वाला मखाना एक और लाभ पहुँचा रहा है। वह लाभ है महिलाओं को सशक्त करने का। मछुआरा समुदाय से ताल्लुक रखने वाली महिलाएँ मखाना का उत्पादन कर आधी आबादी की मेहनत, लगन का उदाहरण पेश कर रही हैं।
फ्लोरोसिस प्रभावित बस्तियों में 2017 तक सुरक्षित पेयजल
फ्लोराइड से ग्रस्त ग्रामीण व बच्चे नई दिल्ली (भाषा)। देश की 14,131 बस्तियों के फ्लोरोसिस से प्रभावित होने का जिक्र करते हुए सरकार ने शुक्रवार को कहा कि साल 2017 तक ऐसी बस्तियों में सुरक्षित पेयजल सुविधा उपलब्ध करा दी जाएगी।
लोहसरी से शैलेंद्र
खेती से तस्वीर व तकदीर कैसे बदलती है. ये देखना है, तो मुजफ्फरपुर के बोचहां प्रखंड का लोहसरी गांव सबसे उपयुक्त रहेगा. यहां के ज्यादातर लोगों ने खेती से सफलता की कहानी लिखी है. इस गांव में हाल के दिनों या सालों में खेती से फायदा कमाने की तरकीब नहीं सीखी है. दशकों से गांव में उन्नत खेती होती रही है. पीढ़ियां बीती हैं, लेकिन खेती का जलवा बरकरार है. 90 के दशक से पहले यहां अलुआ (शकरकंद) की बड़े पैमाने पर खेती होती थी, लेकिन उसके बाद यहां के किसानों ने मक्का उत्पादन की ओर रुख किया और अभी मुजफ्फरपुर जिले में लोहसरी सबसे ज्यादा मक्का पैदा करनेवाले गांव है. इसके आसपास के गांवों में भी बड़े पैमाने पर मक्का की खेती होती है. गांव के किसान बताते हैं कि लगभग पांच हजार एकड़ में हर साल मक्के की फसल लगायी जाती है. इसी वजह से एक दर्जन से ज्यादा मक्के का बीज बेचनेवाली कंपनियों के प्रतिनिधि गांव का चक्कर लगाते रहते हैं.
वैज्ञानिक तरीके से खेती
प्रगतिशील किसान नीरज नयन बताते हैं कि लोहसरी मक्का उत्पादन में ऐसे ही नंबर वन नहीं बना है. इसके पीछे की वजह वैज्ञानिक तरीके से खेती करना है. गांव के किसानों ने अपने खेतों की मिट्टी की जांच करवायी, जब उन्हें पता चला कि मिट्टी में जिंक की कमी है, तो उन्होंने अपने खेतों में जिंक डालना शुरू किया. धान की फसल कटते ही खेतों में दस किलो बीघा के हिसाब से जिंक डाली जाती है. इसी में एक किलो प्रति बीघे से हिसाब से बोरन डालते हैं. इसके बाद खेतों में जैविक खाद डाली जाती है. ये सब होने के बाद खेतों की जुताई शुरू की जाती है, ताकि मक्के की फसल के लिए खेत को तैयार किया जा सके.
35 दिन में पहला पानी
लोहसरी के आसपास इस समय सिर्फ और सिर्फ मक्के की ही खेती दिख रही है. चारों ओर मक्के से खेतों में हरियाली है. अभी कुछ दिन पहले ही मक्का बोया गया है. अब बढ़ रहा है. गांव भ्रमण के दौरान हरेराम मिश्र से मुलाकात होती है. पूछने पर कहते हैं, मक्का के अलावा यहां किसी और चीज का खेती कम ही होता है. हम भी 1992 से मक्का की खेती कर रहे हैं. वो बताते हैं सबने मक्का की सिंचाई का अपना इंतजाम कर रखा है. सरकारी व्यवस्था के नाम पर यहां दो बोरिंग है, लेकिन एक भी नहीं चलती है. सब लोगों ने अपने खेतों में बोरिंग कर पंपिंग सेट बिठा रखा है. उसी से सिंचाई होती है. मक्के की फसल को पांच पानी चाहिए और पहला पानी फसल बोने के 35 दिन लगता है.
मक्का खुशहाली का आधार
खेतों में मजदूरी का काम करनेवाले दिनेशी पासवान कहते हैं कि गांव के लोग मक्के की खेती पर विशेष ध्यान देते हैं, क्योंकि यहीं यहां की खुशहाली का आधार है. मक्के को पानी व खाद देने का कलेंडर बना रखा है. जिस दिन मक्के को पानी देना है. भले ही उनसे और काम छूट जायें, लेकिन पानी देना नहीं भूलेंगे. वो कहते हैं, गांव में जो खुशहाली आयी है, वो सब मक्के की वजह से ही है. हमारे साथी जो काम की तलाश में बाहर जाते हैं, वो भी जब मक्का कटता है, तो वापस घर आ जाते हैं. इसी से उनके घर की पूरे साल की रोजी-रोटी चलती हैं. कमाई से होनेवाली आमदनी उनकी बचत होती है.
धान से लागत, मक्का से कमाई
किसान कामेश्वर मिश्र के पास 25 एकड़ का जोत है, ज्यादातर जमीन में मक्के की खेती करते हैं. गांव की चौपाल में कामेश्वर की आवाज बिल्कुल अलग गूंजती है. वो साफ-साफ बोलते हैं. कहते हैं, हम लोग खेतों में मक्का व धान की खेती करते हैं. गेंहू केवल खाने व फसल चक्र को बदलने के लिए उपजाते हैं. बताते हैं, गेंहू से तीन गुना ज्यादा मक्के में फायदा है. वो कहते हैं, धान से जो फायदा होता है. वो मक्के की फसल में लागत के काम आता है, जबकि मक्के से होनेवाली आमदनी गांव के किसानों की बचत है. कामेश्वर के बेटे सुनील कुमार व जय प्रकाश भी खेती करते हैं, जबकि पोता गौरव इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है.
सरकार खरीदे मक्का
लोहसरी के हेमंत कुमार मिश्र भी मक्के की उन्नत खेती करते हैं. कहते हैं, गांव में सरकारी स्तर पर कोई सुविधा नहीं है. निजी कंपनियों के मक्का खरीद पर रोक है, लेकिन सरकार की ओर से मक्का की खरीद नहीं की जाती है. ऐसे में हम लोगों को बाजार पर ही निर्भर रहना पड़ता है. सरकार को गेंहू व धान की तरह मक्का की खरीद भी करनी चाहिए, उसके लिए क्रय केंद्र खोलना चाहिए. गांव में सिंचाई के लिए पंप लगे हैं, उन्हें चालू करवाना चाहिए. सरकारी हस्तक्षेप बढ़ेगा, तो निजी कंपनियों का प्रभाव कम होगा. अभी गांव के लोगों को कंपनियों की ओर से बीज बेचने को लेकर तरह-तरह का प्रलोभन दिया जात है. गिफ्ट से लेकर शहर के होटलों में पार्टी तक दी जाती है.
अध्यापन के साथ खेती
डॉ शत्रुघ्न प्रसाद मिश्र भी गांव के उन्नत किसानों में हैं. इनके यहां उत्तर बिहार में सबसे ज्यादा मक्के का उत्पादन होता है. ये बेगूसराय के जीडी कॉलेज में इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष हैं, लेकिन खेती से इनका नाता कभी नहीं टूटा. शनिवार को घर आते हैं और रविवार को खेती-बारी का काम देखते हैं. ऐसा करते हुये इन्हें 35 साल हो गये हैं. इनके बेटे भी खेती करते हैं. नीरज नयन व राकेश रत्न दोनों ने पोस्ट ग्रेजुएट किया है. राकेश कुमार रत्न ने एमएससी की है, लेकिन खेती करते हैं. नीरज ने पोस्ट ग्रेजुएट के बाद खेती शुरू की, वो बिहार भाजपा किसान मोरचा के सचिव भी हैं. नीरज का भतीजा नवनीत किशन अभी सिक्किम में एनआइटी कर रहा हू. भतीजी मधुलिका रत्न भी पढ़ाई में अव्वल है. कई पुरस्कार प्राप्त कर चुकी है.
गांव के साथ शहर में घर
लोहसरी के लोगों ने खेती के सहारे अपनी किस्मत चमकाई है, लेकिन अपनी आनेवाली पीढ़ी को जमाने के साथ देखना चाहते हैं. गांव में चमचमाते मकान के साथ यहां के ज्यादातर लोगों के मुजफ्फरपुर शहर में भी मकान हैं. दिन भर गांव में खेतों में काम करने के बाद ज्यादातर लोग शहर लौट आते हैं. लगभग पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर शहर है. इस वजह से आने-जाने में ज्यादा समय नहीं लगता है. शहर में बच्चों को अच्छी शिक्षा यहां के लोग दे रहे हैं. बच्चे भी इनकी आशाओं पर खरे उतर रहे हैं. गांव के लगभग आधा दर्जन बच्चे इस समय इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ रहे हैं. इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में भी नौकरियां हासिल कर रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि नौकरी करने के बाद भी गांव के लोगों का खेती से लगाव बना है. वो खेतों में शान से काम करते हैं.
आठ से साठ बीघे हो गयी जमीन
गांव के राधेश्याम सिंह ने खेती के बल पर वो कर दिया है, जिसकी कल्पना कम ही लोग करते हैं. बचपन में ही पिता की मौत हो गयी. इसके बाद भाइयों का बोझ राधेश्याम पर आया. खेती आठ बीघे थी. उन्नत खेती शुरू की. भाइयों को पढ़ाया. खेती को आगे बढ़ाया. आज इनके पास साठ बीघे जमीन है. पक्का मकान है. राधेश्यम सिंह ने त्रिभुवन सिंह व राम विनोद सिंह को पोस्ट ग्रेजुएट करवाया. त्रिभुवन सिंह की दो साल पहले नौकरी लगी है. हाईस्कूल में अध्यापक हैं. अध्यापन के साथ खेती करते हैं, जबकि राम विनोद सिंह नौकरी करते हैं. त्रिभुवन सिंह का बेटा कुमार गौतम आइआइटी कर चुका है, जो पावरग्रिड में इंजीनियर है.
खेती के लिए नौकरी छोड़ दी
स्कूल इंस्पेक्टर की नौकरी करनेवाले गांव राज पलटन मिश्र ने सत्तर के दशक में खेती के लिए नौकरी छोड़ दी थी. खेती के दम से ही उन्होंने मुजफ्फरपुर के सिकंदरपुर में मकान बनाया. उनके चार बच्चों ने उच्च शिक्षा ग्रहण की और सभी खेती करते हैं. बड़े लड़के राम रेखा मिश्र खेती के साथ गांव में पोस्टमास्टर हैं. छोटे बेटे अनिल मिश्र पैक्स के अध्यक्ष हैं. इन लोगों ने खेती के दम पर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दे रहे हैं.
अशोक हाल में मिले किसानों को सम्मान
लोहसरी गांव के किसानों की मांग है कि हम लोगों का भी सामाजिक तौर पर सम्मान होना चाहिए. जिस तरह से अन्य लोगों को राष्ट्रपति भवन के अशोका हाल में सम्मानित किया जाता है. वैसे ही किसानों को भी सम्मान किया जाना चाहिए. राकेश कुमार रत्न सवाल उठाते हैं कि सामाजिक तौर पर मान्यता नहीं होने के कारण हम लोगों को हेय दृष्टि से देखा जाता है. अगर हम कहीं अपने घर की बेटियों का रिश्ता लेकर जाते हैं, तो हमें किसान समझा जाता है, जबकि हम लोग भी अन्य लोगों की तरह ही हैं, लेकिन हम से ज्यादा नौकरी वाले को मान्यता दी जाती है. ये स्थिति बदलनी चाहिए. देश में सरकार बदली है, तो हमें लगता है कि इससे किसानों की स्थिति बेहतर होगी?
(साभार- प्रभात खबर)